ब्लॉग मित्र मंडली

26/4/10

" ये हिंदू है ! ये है मुस्लिम ! " " रास्ते अपने तू चल… ! "

अंतर्जाल पर कुछ लोगों द्वारा फैलाये जा रहे वैमनस्य की तर्जुमानी नहीं ,
इस पोस्ट की रचनाओं के शीर्षक हैं ये !
धार्मिक सहिष्णुता और
महान् भारत की सनातन संस्कृति एवं सौहार्द की परंपरा के निर्वहन के संस्कारों से वंचित
अनभिज्ञ जन को परमात्मा स द् बु द्धि प्रदान करे , इस प्रार्थना के साथ !
साथ ही है " प्रीत नैं पसारजो " के रूप में एक रचना मेरी राजस्थानी भाषा में भी
*******************************************************

ये हिंदू है ! ये है मुस्लिम !

हिंदू कहां जाएगा प्यारे ! कहां मुसलमां जाएगा ?
इस मिट्टी में जनमा जो , आख़िर वो यहीं समाएगा !

ये हिंदू है ! ये है मुस्लिम !
ऊपरवाला कब कहता ?
आदम की औलाद ! तू कब तक़्सीम से आजिज़ आएगा ?

ना बुतख़ाने राम क़ैद ,
ना क़ैद हरम में ख़ुदा कहीं !
पाकदिली से जहां पुकारो …वहीं सांई मिल जाएगा !

तेरा-मेरा क्यूं करता है ?
साथ तेरे क्या जाएगा ?
दौलत-हुस्न-ज़मीं का टुकड़ा , सभी धरा रह जाएगा !

पाक-कलाम पढ़ेगा मोमिन , कभी शिवाले में जा'कर !
कभी बिरहमन अल्लाह के घर भजन-वाणियां गाएगा !
दूर किसी कोने में उस दिन
शैतां जा' छुप जाएगा !
इसी ज़मीं का ज़र्रा-ज़र्रा तब जन्नत बन जाएगा !
…तब जन्नत बन जाएगा !!
- राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar


रास्ते अपने तू चल…!

अपने होंठों की हंसी… किसी और लब पॅ निसार कर !
दिल किसी का भी दुखे… वो काम , मत ऐ यार कर !
ना किया तूने करिश्मा… वो तू अबके बार कर !
जीतले दुनिया तू… अपने दुश्मनों से प्यार कर !!

दुश्मनों की दुश्मनी का… ख़ौफ़ क्यों रह जाएगा !
तू गले उनको लगाने… उनके घर जो जाएगा !
मिट न पाएगी कभी… रंजिश दिलों के ज़हर से ;
हां…मगर ख़ुद तू ही… आख़िर एक दिन मिट जाएगा !!

तू यहां आया है गर… तो नाम कुछ करता ही जा !
याद रक्खे ये जहां… तू काम वो करता ही जा !
हो ज़रा औरों को… तेरे होने का एहसास भी ,
भर सके ख़ुशियों से गर… दामन हर इक भरता ही जा !!

दूसरों के अश्क… अपनी आंख से बहने भी दे !
अपने दिल को… दूसरों के दर्द तू सहने भी दे !
दुनिया दीवाना कहे… तुझको , तू मत परवाह कर ;
रास्ते अपने तू चल… कहते , उन्हें कहने भी दे !!
- राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar

*******************************************************
प्रीत नैं पसारजो !

प्रीत नैं पसारजो !
बैर नैं बिसारजो !
गांठ नीं घणी कसो !
राड़ मत मठारजो !

बाळजो न काळजो !
काळजां नैं ठारजो !
राखजो - निभावजो !
हेत नीं न झारजो !

राम रट' रहीम रट',
जूण नैं सुधारजो !
राम ख़ुदा एक है ,
किण नैं ई पुकारजो !

हिंदू मुसळमान सिख ,
देश ; मिळ' संवारजो !
फणफणावै नाग ; फण
काटजो - बंधारजो !

आबरू रुखाळजो !
रुळ रयी बुहारजो !
थे बडा कॅ म्है बडा ,
अहम् मत फिंगारजो !

काच सूं मिळ्या करो ,
साच सवीकारजो !
जे मिनख मिळै कठै ,
आरती उतारजो !
-राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar

*******************************************************
यहाँ सुनें  
"अपने होंठों की हंसी"


- राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar

 यहाँ सुनें
"हिंदू कहां जाएगा प्यारे"


- राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar

यहाँ सुनें  
"प्रीत नैं पसारजो !"


- राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar

*******************************************************
आपकी प्रतिक्रियाओं से ही पता चलेगा कि
आपके मित्र द्वारा अपनी रचनाओं का सस्वर प्रस्तुतिकरण आपको कैसा लगा ?

*******************************************************
इस बीच जिन जिन ने तटस्थ भाव से उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रियाएं दीं ,
…और ब्लॉग मित्र मंडली में मेरे साथ सहभागिता के साक्षी बने ,
हार्दिक आभार और कृतज्ञता उन सब के प्रति !

…हाज़िर होता हूं फिर से … जल्द से जल्द

"शुभास्ते संतु पंथानः "
***
*******************************************************

22 टिप्‍पणियां:

SAMVEDANA KE SWAR ने कहा…

आपने जिस आदर्श भारत की कल्पना की है और जो आस दिखाई है अपने गीत के माध्यम से वह सर्वथा सराहनीय है... हमारे हाथ जब भी उस परम्पिता की वंदना में उठें, हमारे होठों से यही पुकार निकले जो आपके गीत की पंक्तियों में वर्णित है...

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

bahut achhi rachnayen hain rajendr ji ...

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

बहुत प्रासंगिक लेख है... शुभकामनाएं...
हर मज़हब अपनी जगह अच्छा है और हर धार्मिक किताब इंसानियत का सबक़ देती है, लेकिन कुछ लोग मज़हब' के ठेकेदार' बनकर मज़हब की आड़ में अपना उल्लू सीधा करते हैं... और मज़हब को बदनाम करते हैं... दरअसल, अपने मज़हब को 'श्रेष्ठ' और दूसरे के मज़हब को 'तुच्छ' समझने की मानसिकता ही नफ़रत फैलाती है... जिन लोगों का मक़सद सिर्फ़ नफ़रत की आग फैलाना होता है... शायद वो नहीं जानते कि एक न एक दिन ये आग उनका घर भी फूंक सकती है... देश में हुए कुछ दंगे इसी बात का सबूत हैं...

जय हिन्द
वन्दे मातरम्

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

खूबसूरत प्रविष्टि !

रीडर में सब्सक्राइब कर रखा है ! आपका ब्लॉग रीडर से पढ़ने वाले लोगों को एक दिक्कत अक्षरों के रंग से है ! ब्लॉग पर काला बैकग्राउंड होने के कारण सब ठीक है, पर रीडर में बैकग्राउंड भी सफेद हो जाता है, जिससे सफेद और पीले रंग के अक्षर पढ़े नहीं जा पा रहे !

खैर, हम तो ब्लॉग पर आकर पढ़ेंगे ही !

girish pankaj ने कहा…

aisi soch hi hame sadbhavanaa ke raste par le jayegi. samaj ko isi tarajh k vichar chahiye. mujhe apnaa shr yaad aa gaya- subah mohabbat shaam mohabbat/ apnaa to hai kaam mohabbat/ ham to karte hai donon se/ alla ho yaa raam mohabbat. badhai.

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

क्रिएटिव मंच-Creative Manch ने कहा…

"हिंदू कहां जाएगा प्यारे ! कहां मुसलमां जाएगा ?
इस मिट्टी में जनमा जो , आख़िर वो यहीं समाएगा !"


दोनों रचनाएं बेहतरीन हैं
आपके स्वर में गीत सुनना
अत्यंत आनंददायक अनुभव रहा !
बहुत दिल से रचनापाठ करते हैं आप
हम आपके और गीत भी सुना चाहेंगे !
साधुवाद

आभार

गौतम राजरिशी ने कहा…

एक सामयिक रचना राजेन्द्र जी...

तिलक राज कपूर ने कहा…

बहुत अच्‍छे विचार लिये हैं आपने, और उन्‍हें व्‍यक्‍त करने के लिये अच्‍छे शब्‍द। बधाई।

अल्पना वर्मा ने कहा…

सभी कवितायेँ बेहद उम्दा हैं.
सामायिक भी.
इन्हीं भावों की आज के समय में आवश्यकता है.
सब मिल कर साथ चलें तो देश आगे बढ़ता है.
'तेरा-मेरा क्यूं करता है ?साथ तेरे क्या जाएगा ?दौलत-हुस्न-ज़मीं का टुकड़ा , सभी धरा रह जाएगा !'

काश ! हर व्यक्ति यह समझ पाए!
----------

बहुत ही भावपूर्ण बेहतरीन रचनाएँ प्रस्तुत की हैं.
-हिंदी उर्दू -राजस्थानी इन सभी भाषाओँ में कविता लिखना...यह भी आप की खासियत है.
हिंदी ब्लॉगजगत में एकमात्र अद्भुत उदाहरण .

अल्पना वर्मा ने कहा…

आप के स्वर में कवितायेँ सुनी,बहुत अच्छा लगा .

आप की आवाज़ बहुत अच्छी है.
कविता पाठ बहुत ही प्रभावी है.
यह प्रस्तुति बेहद पसंद आयी .

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही सटीक, सामयिक और सुंदर मधुर कविता पाठ. हार्दिक शुभकामनाएं.

रामराम.

Yogendra Art Vibration ने कहा…

jai hind....

ओम पुरोहित'कागद' ने कहा…

aapka blog,aapki rachnayen,aapki tasveeren sab kuchh badhiya hai.tarannum me tarane bhi lubhate bhate hain. badhai ho!
kabhi hmari gali bhi aaya karo sanam!ham hamare blog par aapke kadmo ke liye palken bichhay baithe hain.
or kya chal raha hai?

नीरज गोस्वामी ने कहा…

राजेंद्र जी
आप की तीनो विलक्षण रचनाएँ आप के धीर गंभीर स्वर में सुनना सोने पर सुहागे वाली बात है...इतना आनंद आया की शब्दों में बयां करना असंभव है...आप पर माँ सरस्वती की कृपा यूँ ही बनी रही ये ही कामना करता हूँ...
नीरज

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

ओये होए ......
मैं तो मुरीद हो गयी जी आपकी ....
क्या आवाज़ है .....
क्या गाते है ....
तौबा .....
क्या सुर है ....
क्या गला है ....
क्या कशिश है ....
बिना साज संगीत के .....
गज़ब....गज़ब....गज़ब्ब्ब्ब ...!!
कहाँ से सीखा ये हुनर .....??
ओये होए ....बहुत खूब .....
बहुत खूब ....

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

नमस्‍कार श्री राजेन्‍द्र भाई जी

आपकी तीनो ही रचनाएं बहुत ही संवेदनशील है खास कर राजस्‍थानी रचना ''प्रती नै पसारजो'' जो आज के हालातों पर समष्टि भाव से ओतप्रोत एक सुन्‍दर सन्‍देश देती है|
अब तो बस दुआ है कि आपकी इन रचनाओं जैसा सुन्‍दर वातावरण भी बने और आपकी लेखनी सार्थक हो जाय|

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

आपका ब्लॉग बड़ा प्यारा है..
बिल्कुल आपकी रचनाओं की तरह.

श्याम सखा 'श्याम' ने कहा…

खूब सूरत भावाभिवक्ति

रश्मि प्रभा... ने कहा…

आदर्शों की पहचान कराती रचना... बहुत ही अच्छी लगी

nilesh mathur ने कहा…

सुन्दर रचनाएँ ! पढ़कर अच्छा लगा !

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

राजेन्द्र जी, आपके गीत आज सुन रहा हूँ.

बेहतरीन!!