ब्लॉग मित्र मंडली

5/5/10

" अगर सच बोलता हूं … ", " पता है ; क्यों बुझाना चाहता " , " शकल सूं नीं पिछाणीजै "



आज प्रस्तुत है तीन ग़ज़लें ! लेकिन पहले एक बात …



* कृपया , सहयोग बनाए रखें ! *
प्रिय मित्रों ! शस्वरं का अंतर्जाल पर शुभारंभ हुए अभी एक महीना 9 मई 2010 को होगा । पहले ग्यारह - बारह दिन
में ही मेरी ब्लॉग मित्र मंडली में तीस से भी अधिक आत्मीयजन सम्मिलित हो चुके थे । …तभी अचानक
मेरी ब्लॉग मित्र मंडली में साइन इन करने वालों में से कइयों को  क्लिक करते ही यह पंक्ति नज़र आनी शुरू हो गई -
"हमें खेद है,साइट के स्वामी ने आपको साइट में शामिल होने से अवरुद्ध कर दिया है."
और तो और …
मैं स्वय जिन जिन ब्लॉग पर फॉलोअर बना था , उनमें से शस्वरं सहित अधिकांश पर से मेरी फोटो गायब हो गई ,
और दुबारा या नये ब्लॉग पर साइन इन करने पर यही नज़र आने का सिलसिला बना हुआ है -
"We're sorry, the site owner has blocked you from joining this site."
मुझसे प्यार स्नेह अपनत्व रखने वालों को हो रही असुविधा के लिए मुझे खेद है ।
आशा है , समस्या का पूर्ण निवारण होने तक आप धैर्य और सहयोग बनाए रखेंगे ।
इस समस्या के समाधान में आप में से कोई सहायता कर सकें  तो आभारी रहूंगा ।

*******
अब पेशे-ख़िदमत है आज की तीनों ग़ज़लें…" माधुरी छंद " में
माधुरी छंद ! वही मेरी पसंदीदा  बह्र - ए - हज़ज मुसम्मन सालिम  !  
 
  

ग़ज़ल : 1

" अगर सच बोलता हूं … सर मेरे इल्ज़ाम आता है "

पड़ा हूं पेशोपस में मैं , है यह दरपेश दुश्वारी
रखूं अख़्लाक क़ायम , यारखूं मह्फ़ूज़ ख़ुद्दारी
अगर मैं दिल की कहता हूं , ग़ज़ल पर  बोझ बढ़ता है
अगर ख़ामोश रहता हूं , फ़ज़ा हो जाती है भारी
ज़माना तो मुझे हर मोड़ पर नैज़ा लियेढूंढे
नहीं इंसाफ़ सच की यां किसी ने की तरफ़दारी

अगर सच बोलता हूं सर मेरे इल्ज़ाम आता है
रहूं चुप ; पूछता है दिल -  कहां सीखी ये अय्यारी 
करूं किस किस की पुर्सिश मैं , शिकस्ता - वाहिमे ले'कर
ये सरगुम दौरे - हैवानी रहेगा हश्र तक जारी

बुला लेना किसी शब - रोज़ , उठ कर चल पड़ूंगा मैं
सफ़र की , जंग की रखता मुकम्मल मैं भी तैयारी
मेरे अश्आर हैं राजेन्द्र दौलत - मालो - ज़र मेरे
हज़म होती नहीं अहले - हसद को मेरी ज़रदारी
- राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar


" पता है ; क्यों बुझाना चाहता तूफ़ां चराग़ों को "


खड़ा मक़्तल में मेरी राह तकता था मेरा क़ातिल
सुकूं था मेरी सूरत पर , धड़कता था उसी का दिल
बचाना तितलियों कलियों परिंदों को मुसीबत से
सभी मा'सूम होते हैं हिफ़ाज़त-र ह् म के क़ाबिल
पता है ; क्यों बुझाना चाहता तूफ़ां चराग़ों को
हुई लेकिन हवा क्यों साज़िशों में बेसबब शामिल
मैं अपनी मौज में रहता हूं बेशक इक ग़ज़ाला ज्यूं
दबोचे कोई हमला'वर , नहीं इतना भी मैं गाफ़िल 

न लावारिस समझ कर हाथ गर्दन पर मेरी रखना
सितारा हूं , अगर टूटा , …बनूंगा मैं महे-कामिल


ग़ज़ल से जो तअल्लुक  पूछते मेरा ज़रा सुनलें
समंदर भी मेरा , कश्ती मेरी , ये ही मेरा साहिल 
कशिश है ज़िंदगी में जब तलक दौरे-सफ़र जारी
हसीं ख़्वाबों का क्या होगा , मिली राजेन्द्र गर मंज़िल
- राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar

" शकल सूं नीं पिछाणीजै इणां री घात मनड़ै री "

हवा में ज़ैर रळग्यो , सून सगळां गांव घर लागै
अठीनैं कीं कसर लागै , बठीनैं कीं कसर लागै 

शकल सूं नीं पिछाणीजै इणां री घात मनड़ै री
किंयां अळगां री ठा' जद कै , न नैड़ां री ख़बर लागै 
कठै ऐ पूंछ हिलकावै , कठै चरणां में लुट जावै
ऐ मुतळब सूं इंयां डोलै , कॅ ऐ डुलता चंवर लागै

किचर न्हाखै मिनख - ढांढा चलावै कार इण तरियां
सड़क ज्यूं बाप री इणरै ; ऐ नेतां रा कुंवर लागै
निकळ' टीवी सूं घुसगी नेट में आ , आज री पीढ़ी
बिसरगी संस्कृती अर सभ्यता , जद श्राप वर लागै

अठै रै सूर सूं मिलतो जगत नैं चांनणो पैलां
अबै इण देश , चौतरफै धुंवो कळमष धंवर लागै 
जगत सूं जूझसी राजिंद , कलम ! सागो निभा दीजे
कथां रळ' साच , आपांनैं किस्यो किण सूं ई डर लागै
- राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar

* राजस्थानी ग़ज़ल में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ *
ज़ैर रळग्यो = ज़हर घुल गया / सून = सुनसान / सगळां = समस्त् /
लागै = लगता है - लगती है - लगते हैं / अठीनैं = इधर / बठीनैं = उधर /
नीं पिछाणीजै = नहीं पहचानी जाती है / इणां री = इनकी / घात मनड़ै री = मन की घात /
किंयां = कैसे / अळगां री = दूरस्थ की / ठा' = मा'लूम - जानकारी होना /
नैड़ां री = समीपस्थ की / कठै = कहीं - कहां / ऐ = ये /  किचर न्हाखै = कुचल देते हैं /
मिनख - ढांढा = मनुष्य - पशु / जद = तब / अठै रै सूर सूं = यहां के सूर्य से /
चांनणो = प्रकाश / पैलां = पहले / चौतरफै = चारों तरफ़ /
धुंवो कळमष धंवर = धुआं कल्मष धुंध / सागो निभा दीजे = साथ निभा देना /
कथां रळ' साच = मिल कर सत्य - सृजन करें / आपांनैं = हमको - हमें /
किस्यो किण सूं ई = कौनसा किसी से भी /


आज की ग़ज़लों का रंग आपको कैसा लगा , आपकी टिप्पणियों / प्रतिक्रियाओं से  ही  पता चलेगा ।
राजस्थानी ग़ज़ल पर भी आप हिंदी और उर्दू के विद्वानों की टिप्पणी की अपेक्षा रहेगी ।
आप ही के लिए राजस्थानी ग़ज़ल में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ दिए हैं ।

 मेरे राजस्थानी -भाषा -भाषी मित्रों के मौन से सोच रहा हूं कि विचाराधीन
पूर्णतः राजस्थानी भाषा को समर्पित एक अलग ब्लॉग
की
मेरी योजना की  कोई सार्थकता -उपयोगिता होगी भी या नहीं ?

… और जैसा कि मैंने पिछली किसी पोस्ट में कुछ योजनाओं की बात की थी ,
बस…एक और पोस्ट के बाद उनमें से एक योजना पर क्रियान्विति का शुभारंभ है ।
प्रतीक्षा का अपना आनन्द है , … है ना ?

ध्यान रखिएगा , गर्मी और भी तेज होने वाली है ।

ठण्ड रखिए

20 टिप्‍पणियां:

नीरज गोस्वामी ने कहा…

गूगल के अत्याचार से हम सब पीड़ित हैं और अब आप भी उसमें शामिल हो गए...ये कारस्तानी गूगल कई बार कर चूका है और करता रहता है...उसकी फितरत ही ऐसी है कोई क्या करे...???:))
अब बात ग़ज़लों की, राजेंद्र जी आपकी ग़ज़लें बहुत ही दिलकश होती हैं...बात कहने का हुनर आपको खूब आता है, उस्तादों वाली बात है आपकी शायरी में और ये बात कड़ी तपस्या और माँ सरस्वती की कृपा से ही हासिल होती है...आप यूँ ही सतत साहित्य साधना में डूबे रहें ये ही कामना करता हूँ.

अगर मैं दिल की कहता हूं , ग़ज़ल पर बोझ बढ़ता है ...वाह बेहद खूबसूरत मिसरा है...लाजवाब...पूरी ग़ज़ल ही असरदार और मुकम्मल है, आपने अपने ग़ज़ल प्रेम को अपने इस शेर में जिस ख़ूबसूरती से पेश किया है उसकी तारीफ़ के लिए अलफ़ाज़ नहीं हैं मेरे पास...
ग़ज़ल से जो तअल्लुक पूछते मेरा ; ज़रा सुनलें
समंदर भी मेरा , कश्ती मेरी , ये ही मेरा साहिल

राजस्थानी भाषा में आपकी ग़ज़लें बहुत विशेष स्थान रखती हैं, आपकी ग़ज़लों से ये भाषा और भी समृद्ध हुई है...आपका इस क्षेत्र में किया गया योगदान अनुकरणीय है...ग़ज़ल जैसी विधा को जन जन तक पहुँचाने के लिए उसे आम लोगों की भाषा में ही उसे कहना होगा और ये काम आप बखूबी कर रहे हैं...
हवा में ज़ैर रळग्यो , सून सगळां गांव घर लागै
अठीनैं कीं कसर लागै , बठीनैं कीं कसर लागै
बाकमाल मतला है...जितनी बार पढता हूँ उतनी बार और पढने की चाह जागती है...वाह...
इंसान की फितरत को जिस अंदाज़ में आपने इस शेर में कहा है वो अनूठा है...
कठै ऐ पूंछ हिलकावै , कठै चरणां में लुट जावै
ऐ मुतळब सूं इंयां डोलै , कॅ ऐ डुलता चंवर लागै

आपको पढना एक सुखद अनुभव से गुजरने जैसा है.आनंद आ गया...ऐसे ही लिखते रहें...हमेशा.

नीरज

सर्वत एम० ने कहा…

आप ने शर्मिंदा कर दिया. इतनी उस्तादाना तेवर की गजलें और और खाकसारी का आलम ये कि हम से कहा जा रहा है, आपकी प्रतिक्रिया चाहिए.

दोनों गजलें बहुत-बहुत अच्छी है. इस तेवर की गजलें कहने वाला फनकार जब मेरे जैसे, अदना से शख्स से कमेन्ट मांगेगा तो यह उसकी महानता ही समझा जाना चाहिए.

एक निवेदन अवश्य करूंगा, क्षमा याचना के साथ, थोडा अध्ययन अवश्य जारी रखिए क्योंकि मुझ नाचीज़ की नजर में यह सब से जरूरी पहलू है.

राजस्थानी भाषा से पूरे तौर पर अपरिचित तो नहीं हूँ, बोल नहीं सकता, कुछ कुछ समझ लेता हूँ. राजस्थानी गजल में भी आपने कमाल किया और व्यंग्य की जो तीखी धार आपने परोसी, दुआ है कि वह कायम रहे.

एक बार, अंत में आप का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने मुझे लायक समझा मैं इन गजलों पर अपनी राय दूं.

girish pankaj ने कहा…

vaah bhai...aap to ustaad shaair lagate hain...badhai. har sher qaabiletaareef hai aur kaabilegaur bhee hai. aise hee likhate rahe.
ek badee sambhavnaa kaa naam hai rajendra
bus yu hi likhte raho paigaam hai rajendra.
mazaa aa gayaa. baar-baar man kah rahaa hai badhai....

girish pankaj ने कहा…

aur rajasthani ghazal bhi kam nahi hai. aaj kal lok bhashaa me bhi ghazale ho rahi hai.yah achchhi baat hai. aur ''rajsthaanee'' mey vo dam bhi hai.bhai.

अमिताभ मीत ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़लें हैं भाई ....

ओम पुरोहित'कागद' ने कहा…

bhai rajender ji,aap ri peed main samjhun.
GAZAL-
aapri teenu gazlan jordar hai.moti sa po rakhya hai.bhav jorda hai ar tav jprdar !aanand aaygyo!badhayje!

महावीर ने कहा…

आपकी ग़ज़लें बहुत पसंद आईं. खयालात और बयान की ख़ूबसूरती देखते ही बनती है. हालांकि राजस्थानी ग़ज़ल पढ़ने में थोड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी लेकिन दो साल राजस्थान में रहने से ख़ास मुश्किल नहीं आई.
मैंने आपकी ग़ज़लों को बार बार पढ़ा है और हर दफ़ा पहले से ज़्यादा लुत्फ़ आया. हर शेर दिल को छूता हुआ लगा. इतनी ख़ूबसूरत ग़ज़लें इनायत करने के लिए दाद और शुक्रिया क़ुबूल कीजिए.
महावीर शर्मा

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लगा सारे ग़ज़ल ! सब एक से बढ़कर एक हैं!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

तीनों गज़लें बहुत ही सुन्दर है!

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

आपकी ग़ज़लें पर मैं टिपण्णी करने में असमर्थ हूँ.

राजस्थानी शब्द बोली मुझे पसंद हैं, एक बार में पूरी तरह तो नहीं समझ पाता, यहाँ अर्थ देकर आपने आसान कर दिया.

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

पूर्णतः राजस्थानी भाषा को समर्पित एक अलग ब्लॉग के बजाय आप इसी में पोस्ट जारी रखिये,
हिंदी पाठको को सुविधा होगी राजस्थानी सीखने में. चूँकि आपने राय माँगा था सो मेरे विचार हैं ये.

सुनील गज्जाणी ने कहा…

rajendra jee pranam, bahut bhari sabdavli hai , magar dil chasp hai aap ki gazale , is visha me bikaner me aap ki alag hi pehchan hai.
rajanera jee aap isis me apni dono bhasaon ki rachnaye zari rakhiye qki ye aap ka nizi blog hai aur aap sahi prakar se vyasthit kar sakte hai,
ek baar punah aap ko oomda gaalon ke liye hamari badhae

Devi Nangrani ने कहा…

तारीफ़ के लिए अलफ़ाज़ नहीं हैं मेरे पास...
ग़ज़ल से जो तअल्लुक पूछते मेरा ; ज़रा सुनलें
समंदर भी मेरा , कश्ती मेरी , ये ही मेरा साहिल
Main Neeraj ki har baat se shamil raai hoon aur tahe dil se aapko badhayi deti hoon is blog ke madhyam se aapki puasra shaili v shilp ki naginedaari se sajaayi in ghazals ke liye...Rajasthani bhasha apne aap mein ek sanskrutii hai..Zaroor vikasit kejiyega.

Thoda Jazzy blog n ho to sahitya ke madhyam se apni pehchaan v sthan bana hi leta hai..
Shubhkamanon sahit..Devi Nangrani

तिलक राज कपूर ने कहा…

मैं थोड़ा नहीं, बहुत लेट हो गया और मेरे कुछ कहने से पहले ही आपको ग़ज़ल विधा के मर्मज्ञों का आशीर्वाद का सौभाग्‍य प्राप्‍त हो चुका है। आपकी ग़ज़लों एक बात बहुत अच्‍छी लगी, व‍ह है वैचारिक स्‍पष्‍टता। स्‍थानीय भाषाओं में ग़ज़ल कहने का आपका प्रयास निश्चित ही सम्‍माननीय है।

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

आप की ग़ज़लों की तारीफ़ करने का मतलब है आपकी शान में गुस्ताखी .......मैं अपने आप को इस काबिल नहीं समझता ....बस मैं जितना जानता हूँ ,,,उस हिसाब से कहूँगा ...की बहुत से शानदार लिखा है आपने ...और ये हुनर ईश्वर कुछ ही नेक बन्दों को देता है ,,,,,और आप भी उन खुशनसीबो में से है ...आपके हाथों में साक्षात् सरस्वती का वास है .....और भी बहुत कुछ कहना चाहता हूँ ...पर अल्फाज नहीं मिल रहे

बेनामी ने कहा…

mera aapki lekhni k bare me ab kuch Comment karna ab maaine nai rakhta. kyuki itne bade diggjon k comment aapki saann badha rahe hai.fir b ek baat amitabh ji se kuch umeed or thee. wo kuch kam bole . kuch nai bahut kam bole.

बेनामी ने कहा…

aapki bhasha sudh or samajhne me aasan hai. or rajasthani k liye shabdarth dekar hamare samjhne k liye aasaan kar diya. meri blog me koi pahchan or mail id nai uske liye maaf kare

अल्पना वर्मा ने कहा…

तीनो गज़लें बहुत ही अच्छी हैं.आप की उर्दू शब्दों पर पकड़ काबिले तारीफ है.आप एक बेहतरीन शायर हैं.ख्यालों को शब्दों का जमा पहनाना खूब आता है.
'ग़ज़ल से जो तअल्लुक पूछते मेरा ; ज़रा सुनलें
समंदर भी मेरा , कश्ती मेरी , ये ही मेरा साहिल '
ये शेर ख़ास लगा .
राजस्थानी रचना भी अच्छी लगी.शब्द-अर्थ दे दिए..ज्ञान में इज़ाफ़ा हुआ.आभार.
-----
आप की परेशानी का हल --पाबला जी या आशीष बता सकते हैं.

Kavita Prasad ने कहा…

राजेंद्रजी, आपकी गजलों की प्रस्तुति काफी अच्छी है| पहली टू काबिले तारीफ है, ज़िन्दगी के मूल फलसफे से भरी हुई| दोसरी ग़ज़ल को टिपण्णी देने की मेरी समझ अभी छोटी है, हाँ आपका राजस्थानी गीतों का ब्लॉग सुझाने का ख्याल अच्छा है... मज़ा आ जायेगा पढ़कर|

शुभकामनायें...

Suman Dubey ने कहा…

bahut sundar gajalhai sach bolne se kavi kab se darne lage. namskar