ब्लॉग मित्र मंडली

21/5/10

'मन है बहुत उदास रे जोगी !' 'झुर- झुर' रो - रो' नैण गमावूं !'

मानलें , 
प्रस्तुत हिंदी रचना का जोगी गौतम बुद्ध है या भर्तृहरि है !

…और , रचना में  शुरू से आख़िर तक स्वयं का परिचय दिए बिना ,
विरह वेदना से पीड़ित जो प्रेम पुजारिन पाठकों- दर्शकों से रूबरू है , 

वह यशोधरा है अथवा पिंगला है !
  
कल्पना कीजिए…
किसी अर्द्धरात्रि वेला में , यशोधरा को सोता हुआ छोड़ कर ,



गौतम वैराग्य की चरम उत्कंठा-अनुभूति में मोह - माया के बंधन
और सारे रिश्ते - नाते त्याग कर संन्यास - पथ पर अग्रसर हो गए हों… ! 
या फिर…
राजा भर्तृहरि अपनी जीवन संगिनी रानी पिंगला सहित समूचा राज - पाट , ऐश्वर्य - वैभव ठुकरा कर
अमरत्व की चाह में जोग ले ले , और… किसी दिवस अनायास विरहिणी भार्या से भेंट हो जाने पर ,
उसकी चिर प्रेम जनित विरह वेदना के तीक्ष्ण बाणों से बिंध जाने को विवश हो जाए ,
उसके प्रश्नों के समक्ष निरुत्तर हो जाए , उसके कटाक्षों से आहत हो जाए ………

क्या ऐसी कल्पना , 
प्रस्तुत रचना के माध्यम से किसी अलग काल , परिस्थिति , रोमांच और अनुभूति से
दो - चार करवा पाने में सफल हुई है ?  


रचना पढ़ते हुए सुनें… चाहे सुनते हुए पढ़ें…

मन है बहुत उदास रे जोगी !
मन है बहुत उदास रे जोगी !  
आज नहीं प्रिय पास रे जोगी ! 
पूछ न ! प्रीत का दीप जला कर  
कौन चला बनवास रे जोगी !
जी घुटता है ; बाहर चलती  
 लाख पवन उनचास रे जोगी !
अब सम्हाले' संभल न पाती  
श्वास सहित उच्छ्वास रे जोगी !
पी' मन में रम - रच गया ; जैसे  
पुष्प में रंग - सुवास रे जोगी !
प्रेम - अगन में जलने का तो  
हमको था अभ्यास रे जोगी !
किंतु विरह - धूनी तपने का   
है पहला आभास रे जोगी !
धार लिया तूने तो डर कर    
इस जग से संन्यास रे जोगी !
कौन पराया - अपना है रे !  
क्या घर और प्रवास रे जोगी !
चोट लगी तो तड़प उठेगा    
मत कर तू उपहास रे जोगी !
प्रणय विनोद नहीं रे ! तप है !  
और सिद्धि संत्रास रे जोगी !
छोड़ हमें राजेन्द्र अकेला    
है इतनी अरदास रे जोगी !
 - राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar




यही रचना मेरी ही बनाई धुन पर , मेरे ही स्वर में सुनें यहां।

अपनी पसंद - नापसंद से अवश्य ही  अवगत करवाएं , कृपया !


 - राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar

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मक़्बूल शायर मोहतरम राहत इंदौरी साहब की ग़ज़ल के बहुचर्चित शे'र
 
विधवा हो गई सारी नगरी 
कौन चला बनवास रे जोगी
की तर्ज़ पर
"आज की ग़ज़ल" ने 
मिसरा-ए-तरह "कौन चला बनवास रे जोगी" पर तरही मुशायरा आयोजित किया हुआ है ,
इसकी चौथी क़िस्त में मेरी रचना भी सम्मिलित है ।

***

और अब एक राजस्थानी ग़ज़ल प्रस्तुत है


झुर- झुर' रो - रो' नैण गमावूं !
झुर- झुर' रो - रो' नैण गमावूं !
कींकर थां' नैं म्हैं बिसरावूं ?
नेह लगा' थे मुंह मोड़्या ; नित
लिख-लिख' पाती म्हैं भिजवावूं !
प्रीत करी बिन स्वारथ म्हैं तो  
था' नैं सिंवरूं ,धरम निभावूं !
सूकै खेती बिन बिरखा ज्यूं
थां' रै बिन दिन - दिन कुम्हळावूं !
नीं आवो थे , नीं म्हैं भूलूं
प्रीत करी क्यूं म्हैं पछतावूं !
 पुषब चढावूं ओळ्यूंड़ी रा
आंसूड़ां री जोत जगावूं !
देव बसै घट मांहीं म्हारो
मन - मिंदरियै धोक लगावूं !
 बंध करूं म्हैं आंखड़ल्यां ; अर 
 राजिंद पिव रा दरशण पावूं !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

©copyright by : Rajendra Swarnkar

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उपरोक्त राजस्थानी ग़ज़ल में प्रयुक्त शब्दों का भावार्थ
 केवल और केवल आपके लिए

झुर- झुर'  = विरह वेदना से तड़प-तड़प करकींकर = कैसे / बिसरावूं = विस्मृत करूं /
था' नैं सिंवरूं  = आपको ही स्मरण करती हूं / कुम्हळावूं  = मुरझाती हूं /
पुषब चढावूं = पुष्प अर्पित करती हूं / ओळ्यूंड़ी रा = स्मृतियों के  / घट मांहीं = हृदय में /
म्हारो = मेरा पिव रा दरशण पावूं = प्रियतम के दर्शन पाती हूं




…और इस बीच
कितनी विराट और प्रबुद्ध हस्तियों का स्नेह और आशीर्वाद शस्वरं के माध्यम से मुझे मिला !
कितने आत्मीयजनों के साथ संबंध प्रगाढ़ हुए !
आप सबके  सहयोग , सद्भाव , अपनत्व , सहृदयता और मित्रता से धन्य हो गया हूं मैं !
 धन्यवाद या आभार कह कर इन संबंधों की गरिमा का हल्का मूल्यांकन नहीं करना चाहता !
 

जलता रहे दीप … देता रहे प्रकाश … मिटना ही है हर कल्मष को …

28 टिप्‍पणियां:

गौतम राजरिशी ने कहा…

तरही प्रशंसनीय बुनी है राजेन्द्र जी...

ब्लौग का अतिशय ग्राफिक्स चुभता है किंतु आँखों को।

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर गीत...सुनना बहुत अच्छा लगा.

girish pankaj ने कहा…

dono ghazale pyari hai. ''kaun chalaa'' ko ''aaj ki ghazal'' me dekh chuikaa tha. yahaan poori ghazal hai. shilp aur bhaav dono ui star par in rachanon ko dekhataa hoo, aur kush hota hoo, ki behatar likhane-sochane vaale bane huye hai.

तिलक राज कपूर ने कहा…

आपके इस ग़ज़ल गायन को सुनकर और ग़ज़ल संबंधित ग्राफिक्‍स को देखकर स्‍पष्‍ट होता है कि ईश्‍वर ने आपमें एक कलाकार के साथ ग़ज़ल कहने की क्षमता क्‍यूँ दी है।
कलाकार हमेशा कल को आकार देता है, बीता कल हो या आने वाला कल। बीते कल का आकार प्रस्‍तुत करता है कि आज और आने वाले कल का आधार प्रस्‍तुत हो और आने वाले कल का आकार प्रस्‍तुत करता है जिससे आज जागृत हो आने वाले कल के लिये। और साहित्‍यकार हुआ इन कलों को आज प्रस्‍तुत करने वाला।
गौतम राजरिशी के सुझाव पर भी ध्‍यान देने की जरूरत है।
ब्‍लॉग का ग्राफिक्‍स ब्‍लॉग की प्रस्‍तुति पर भारी नहीं पड़ना चाहिये।

अल्पना वर्मा ने कहा…

वैराग्य को शब्द चित्र सा बनती बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल है..
और आप ने अपने स्वर में प्रस्तुति भी दी...बेहद प्रभावी लगी.
बहुत ही सुन्दर चित्रों का चयन किया है.
आप की कलाकारी भी अद्भुत है.
एक प्रभावी पोस्ट.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा…

gazal sade prashth par grihanee kee tarah pyiy lagatee hai atyadhik sajavat men kothevalee.

donon rachnayen pasand aayee. khaskar rajasthanee ne man moh liya.

tarahee gazal men bhee aapka kaam kabile tareef hai.

पंकज सुबीर ने कहा…

आपके ब्‍लाग पर आता हूं तो ग्राफिक्‍स की अधिकता तथा तीखेपन के कारण कुछ पढ़ नहीं पाता । आज भी वही हुआ

सर्वत एम० ने कहा…

राजेंद्र जी, आज की गजल पर इसे पढ़ा भी और सारा टंटा भी देखा. जब लोगों को 'पवन उन्चास' जैसे मुहावरे भी ज्ञात न हों फिर क्या कहा जाए. मेरा मानना यह है कि जब हम किसी रचनाकार को आमंत्रित करके उसकी रचनाएँ मंगाएं, फिर उसने गलत लिखा हो सही, उसे पोस्ट होना चाहिए, बाकी निर्णय टिप्पणीकार स्वयं ले लेंगे.
गजलें मुझे पसंद आईं और सबसे अच्छी बात यह रही कि राजस्थानी गजल शब्दशः मेरी समझ में आ गयी, बिना किसी प्रयत्न के, अद्भुत!!
आप जन्मजात रचनाकार हैं, प्रकृति ने स्वयं आप में मेधा ठूंस ठूंस कर भरी है, मेरी हैसियत कहाँ जो आपकी प्रशंसा करूं.

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

आज ग़ज़ल सुना... गायन में प्रस्फुटित दर्द को महसूस भी किया.
एक कलाकार के रूप में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आप. "बनवास रे जोगी" पर विस्तृत ग़ज़ल देख आज इसके भाव को करीब से समझ पाया.

श्रद्धा जैन ने कहा…

Lakh pawan unchas re jogi
waah kitna sunder pryog.......

mat kar tu uphaas ...... bahut hi sateek baat kahi hai

bahut achchi gazal

blog ke look ke liye main bhi Goutm ji ke saath sahmat hun ... kuch light sa rakh sake to sukhdaayi ho jaaye

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

ब्लाग को भी ग़ज़ल जैसा बना लीजिये तो मजा दोगुना हो जाएगा .....

Reetika ने कहा…

prashansneeya !

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

मै अगर कुछ भी कहूंगा तारीफ में तो लब्‍ज कम पड जाएंगे...लाजवाब, बेमिसाल और बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं आप । आपकी ये विरह अभिव्‍यक्ति आपके ज्ञान और अभिव्‍यक्ति का बेजोड नमूना है । आभार और बधाई ।।

चैन सिंह शेखावत ने कहा…

बहुत-बहुत बधाई राजेंद्र जी,
दोनों ग़ज़लें बेहद पसंद आई.'कौन चला बनवास' तो 'आज की ग़ज़ल'पर पढ़ चुका था ,लेकिन राजस्थानी ग़ज़ल ने तो मन मोह लिया.
! पुषब चढावूं ओळ्यूंड़ी रा आंसूड़ां री जोत जगावू!
क्या बात है!

नीरज गोस्वामी ने कहा…

जोगी वाली ग़ज़ल की धुन ऐसी है के एक बार जबान पर चढ़ने के बाद उतर ने का नाम ही नहीं ले रही...आनंद आ गया रचना पढ़ और सुन कर...वाह...और राजस्थानी भाषा वाली रचना की तो क्या कहूँ जैसी मीठी बोली वैसी ही मीठी रचना...दिल में घर कर गयी...मेरी कोटिश बधाई स्वीकार करें...गौतम भाई ने सही कहा है आपका ब्लॉग आपकी रचनाओं के अनुरूप नहीं है...उसे सौम्यता प्रदान कीजिये तब आप की रचनाएँ और निखर कर सामने आएँगी...सुन्दरता सौम्यता से आती है फैशन से नहीं :))

आरिज़-ओ-लब सादा रहने दो
ताज महल पर रंग ना डालो

नीरज

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

jogi ki baaten pasand aayeen swarnkaar ji ..pehli baar aap ki rajsthani ghazal bhi padhne ki koshish ki .. poori tarah to samjh nahi aayi ..par ek sher bada pasand aayaa..kyunki wo samjh aa gaya ...hehehe

सूकै खेती बिन बिरखा ज्यूं थां' रै बिन दिन - दिन कुम्हळावूं

ye wala.... :)

प्रवीण शाह ने कहा…

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प्रिय मित्र,

पहली बार आया आपके ब्लॉग पर...

चोट लगी तो तड़प उठेगा
मत कर तू उपहास रे जोगी !
प्रणय विनोद नहीं रे,तप है !
और सिद्धि संत्रास रे जोगी !


बहुत सुन्दर, परंतु यह जरूर कहूँगा कि ग्राफिक्स की अधिकता पोस्ट को पढ़ने के आनंद में खलल डाल रही है, और ब्लॉग लोड होने में भी बहुत समय ले रहा है...संतुलन बैठाईये दोनों में ।

आभार!

madan ने कहा…

वाह सा राजेन्द्र जी,
बहुत खूब. आपरी मेणत ने घणा रंग.
मदन गोपाल लढ़ा

nilesh mathur ने कहा…

राजेंद्र जी, प्रणाम,
कमाल कि प्रस्तुति है, मेरे ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद्, आशा है आप इसी तरह मेरा उत्साह बढ़ाने के साथ ही मेरा मार्गदर्शन भी करेंगे! भैया एक छोटा सा सुझाव है कि अपने ब्लॉग कि तड़क भड़क को थोडा कम कर दे, आँखों को चुभने वाले रंग हैं!

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

ब्लॉग जगत के सभी महारथी आपके ब्लॉग पे हैं .....ये आपके भीतर बसी अद्भुत सरस्वती की देन है ....गीत कल सुनुगी आज बहुत रात हो गयी .....
कुछ दिनों से काफी व्यस्तता रही पर आपकी मेल बार बार याद दिलाती रही ....की कुछ अनमोल सा छूट गया है नज़रों से .....
हाँ आपकी श्रीमती जी यूह ही मुस्कुराती रहे आपके सामने..... दुआ है .......!!

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

आदरणीय राजेन्द्र जी ....बहुत कोशिश के बाद अनुशरण की लिस्ट में शामिल हो पाया ....आपकी लगभग सभी रचनायें पढ़ी और बढे ध्यान से सुनी भी ...मुझे shashtriya संगीत का बहुत शौक रहा है ...आपकी गायन सुनकर मन प्रफुल्लित हो गया ,,कुछ downlod भी किया है ..रत्ती भर कमी लगी..सिर्फ गायन है बाध्यय्न्त्र नहीं है ....पर ये भी बहुत बेहतर है ... मेरे पसंदीदा ब्लोगरों की लिस्ट में सम्माननीय स्थान रखते हो ,,,,,आपकी हर रचना की तारीफ़ मैं नहीं कर सकता ,,इस लिए नहीं की समय ना हो ..वरन इस लिए की ...सही न्याय नहीं कर पाऊंगा ...बस इतना कहूँगा की जब आपकी रचना के अंत में आपके नाम को पढता हूँ तो मुझे अपने नाम पर भी फक्र होता है ...जो नाम आजतक साधारण लगता था ....ख़ास हो गया ,,,,अब तक माननीय 'शरद कोकस' जी और आप मेरे मार्गदर्शक गुरु हो ....मैं भी कुछ लिखता हूँ ..अब तक देखा की टिपण्णी पाना आसान है ,,,अच्छा लिख पाना मुश्किल ....आप से मैं सुझाव चाहता हूँ ....जो भी कमी लगे ...उस पर अमल करने का आदेश दे ...आपका आशीष और स्नेह पाकर शायद मुझे नया आयाम मिले ..मेरी लघभग सभी रचनाएं कचरा है ..बस एक पर कुछ श्रम किया है साथक हुआ या नहीं अवश्य बताए .....बेसब्री से इन्तजार है ...आप हमनाम बन्धु -राजेन्द्र मीणा आपके अपने राजस्थान से ....रचना की लिंक http://athaah.blogspot.com/2010/05/blog-post_28.html

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

जोगी वाली ग़ज़ल की धुन ऐसी है के एक बार जबान पर चढ़ने के बाद उतर ने का नाम ही नहीं ले रही...आनंद आ गया रचना पढ़ और सुन कर...वाह..

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

अद्भुत ....लाजवाब .....आपके स्वर ....आपकी आवाज़ सुनी ......नमन .....!!

जोगी वाले में अंत में आपने है इतनी अरदास लिखा और है तुझसे अरदास रे जोगी गया .....दोनों ही शब्द परिपूर्ण ......!!

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

और एक बात कहूँ ...?
आपकी ये दर्द भरी आवाज़ सुनकर तो जी करता है अपने सारे पुराने पसंदीदा गीतों को गकाने की फरमाइश कर डालूं .....
आप गीत भी गाते हैं ..?
गाते हैं तो सुनियेगा न .....
एक गीत की फरमाइश है ......ए कात बे तकदीर मुझे इतना बता दे क्यों मुझसे खफा है तू क्या मैंने किया है .......

डा. हरदीप सँधू ने कहा…

सुन्दर गीत....लाजवाब,बहुत खूब....
बहुत-बहुत बधाई राजेंद्र जी !

संजय भास्कर ने कहा…

आपके शानदार ह्रदय के प्रति सादर शुभकामनायें !

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

राजेन्द्र जी ,
मन है बहुत उदास और तृप्त कामनाएँ ,दोनों को संगीत-बद्ध सुना, सचमुच मन तृप्त हुआ .देवि सरस्वती का वरदहस्त आप पर है . विह्वल कर देने वाला काव्य और तन्मय संगीत आपके स्वरों में गूँज रहा हैआप्यायित हुई .
समापन तकआते-आते अंतर की वेदना के स्वर मंगलमय हो उठे है वाणी को समर्पित अर्घ्य-दान हो जैसे .
आपकी साधना सफल हो .

आशा जोगळेकर ने कहा…

अदभुत रचना और उतनी ही सुंदर गायकी । रचना के भाव अपनी आवाज में बखूबी लाये हैं आप ।