ब्लॉग मित्र मंडली

17/3/12

शोलों के दरमियां जा’कर , बर्फ के टुकड़े ढूंढ़ लाना

ज़िंदगी दर्द का फ़साना है
हर घड़ी सांस को गंवाना है
जीते रहना है , मरते जाना है
ख़ुद को खोना है , ख़ुद को पाना है
चांद-तारे सजा तसव्वुर में ,
तपते सहरा में चलते जाना है
जलते शोलों के दरमियां जाकर ,
बर्फ के टुकड़े ढूंढ़ लाना है
तय है अंज़ाम हर तमन्ना का ;
गोया पत्थर पॅ गुल खिलाना है
बुत के आगे है ग़म बयां करना ,
और पत्थर से दिल लगाना है
दर्द बांटे किसी का क्या कोई ,
दर्द साये से भी छुपाना है
ले के तूफ़ान ख़ुद ही कश्ती पर
बीच मंझधार हमको जाना है
-राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar

* अब सुन लीजिए *
मेरी रचना मेरी धुन में  मेरे स्वर में

©copyright by : Rajendra Swarnkar
आशा है,
नज़्मनुमा ग़ज़ल
 आपको पसंद आई होगी ।
अभी मेरे ब्लॉग के साथ बहुत समस्याएं पेश आ रही हैं… 
अपडेट में पता नहीं क्यों सब जगह सात माह पुरानी पोस्ट आती रही,
खुलने में भी दिक्कत है , कमेंट भी अपने आप मिट रहे हैं
आपके स्नेह से ही नई प्रविष्टि प्रस्तुत की है  
 

और हां
ब्लॉगर-ब्लॉग -पुराण
नहीं पढ़ी तो अब पढ़ लीजिए
 



41 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गजब अभिव्यक्ति।

expression ने कहा…

वाह!!!
दर्द बांटे किसी का क्या कोई
दर्द साये से भी छुपाना है...

बहुत खूब सर..

हमें तो पोस्ट दिखी भी..पसंद भी आई....कमेंट भी कर पाए...
:-)

सादर

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर ..

Dr Varsha Singh ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति.....excellent.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बुत के आगे है ग़म बयां करना
और पत्थर से दिल लगाना है ।

वाह वाह !
सींचकर कतरे कतरे से खूने दिल के
पत्थर पे सहरा में गुल खिलाना है ।

नए संकल्पों के लिए शुभकामनायें भाई जी ।

वन्दना ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

वाह!...बहुत खूब!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 19-03-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बहुत खूब..।

ऋता शेखर मधु ने कहा…

दर्द बांटे किसी का क्या कोई
दर्द साये से भी छुपाना है...
बहुत खूब!!!

शिखा कौशिक ने कहा…

bahut sundar rachna ....bahut sundar aapke swar me .sarthak post .aabhar ...मिशन लन्दन ओलंपिक हॉकी गोल्ड

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

वाह राजेन्‍द्र जी बढ़ि‍या

udaya veer singh ने कहा…

क्या बात है जी / बर्फ के टुकड़े....../ अभिव्यक्ति की अप्रतिम प्रस्तुती शुभकामनये जी /

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

ज़िंदगी बहुत ही सूक्ष्मता से analysis किया है आप ने ,,बहुत सुंदर अभिव्यक्ति !!!
ख़ास तौर पर ---
जल्ते शोलोन के दरमियाँ......
दर्द बाँटे किसी का ........
ये दोनों अश’आर तो ज़िंदगी का निचोड़ पेश करते हैं

बहुत बहुत बधाई !!!

सदा ने कहा…

वाह ...बहुत ही अनुपम भाव संयोजन लिए हुए उत्‍कृष्‍ट लेखन .आभार

Kailash Sharma ने कहा…

लाज़वाब प्रस्तुति...हरेक शेर बहुत उम्दा...आभार

Suman ने कहा…

nice

Minakshi Pant ने कहा…

वाह बहुत खूबसूरत गज़ल |

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जीवन की सच्चाई को उतारा है हर शेर में राजेन्द्र जी ... सुभान अल्ला ... बधाई इस गज़ल पे ...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

आज आपके ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आना हुआ. अल्प कालीन व्यस्तता के चलते मैं चाह कर भी आपकी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया. व्यस्तता अभी बनी हुई है लेकिन मात्रा कम हो गयी है...:-)

भाई जी...आप लाजवाब हैं...आपकी जय हो...कमाल की ग़ज़ल...बेहतरीन लेखन ..बधाई स्वीकारें



नीरज

Rewa ने कहा…

wah kya baat hai !

Rewa ने कहा…

kya baat hai ! bahut khoob !

Rewa ने कहा…

bahut khoob !

amrendra "amar" ने कहा…

बहुत खूबसूरत गज़ल,

कर्त्तव्य या अधिकार ने कहा…

bahut khoob :)

आशा जोगळेकर ने कहा…

बुत के आगे है गम बयां करना,
और पथ्तर से दिल लगाना है ।

क्या बात है स्वर्णकार जी । जिंदगी का दर्द कितनी खूबसूरती से बयां किया है ।

Santosh Kumar ने कहा…

गोया पत्थर में गुल खिलाना है !!

सुन्दर भाव ! आभार .

minoo bhagia ने कहा…

achhi ghazal hai rajendr ji

Shanti Garg ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग

विचार बोध
पर आपका हार्दिक स्वागत है।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ...

इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद कबूल करें....आपके लिए बस इतना ही कहूँगा "जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो..."

नीरज

प्रतीक माहेश्वरी ने कहा…

but ke aage gam bayaan karna
aur.. patthar se dil lagaana hai!
bahut khoob!

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सुंदर...बेहतरीन.

मनोज कुमार ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़ल !

Rachana ने कहा…

shabdon aur shvar ka sunder sangam
kamal
ek ek line lajavab
rachana

Saras ने कहा…

सबको अपनी अपनी सलीब को खुद ही ढोना है ...
सुन्दर रचना!

उमेश महादोषी ने कहा…

ग़ज़ल बहुत बढ़िया है. धन्यवाद!

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

behtareen ghazal...daad sweekaaren.

Mukesh Tyagi ने कहा…

माननीय राजेंद्र जी
सादर अभिवादन
अभी-अभी आपकी नई नज्म/गजल देखी...

ज़िंदगी दर्द का फ़साना है
हर घड़ी सांस को गंवाना है

जीते रहना है , मरते जाना है
ख़ुद को खोना है , ख़ुद को पाना है

बहुत सुंदर और जिंदगी की वास्तविकता को अभिव्यक्त करती पंक्तियाँ...बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं!!
सादर/सप्रेम
सारिका मुकेश

poonam ने कहा…

bahut sunder

poonam ने कहा…

bahut sunder

yashoda agrawal ने कहा…

एक उम्दा गज़ल