ब्लॉग मित्र मंडली

5/12/11

कहें गिरधर उसे हम पल में मुरलीधर बना लेते



प्रसिद्ध शायर जनाब कुँवर बेचैन साहब की एक गज़ल से मिसरा-ए-तरह
मेरी लेखनी के माध्यम से इस मिसरा-ए-तरह के लिए मुख़्तलिफ़ रंगो-मिज़ाज के कोई 25 से ज़्यादा अश्'आर मां सरस्वती की कृपा से बने थे । जिनमें भक्ति भी है , नीति भी , आक्रोश भी है  ! तंज़िया भी , मजाहिया भी ! प्यार-मुहब्बत के अश्'आर भी  !
कुल 18 शे'र वहां प्रस्तुत किए थे जो  यहां भी प्रस्तुत हैं ।
( प्रयोग के तौर पर मैंने एक हास्य ग़ज़ल
भी उस मुशायरे में प्रस्तुत की थीजो आपके लिए यहां फिर कभी रखूंगा )

पेशे-ख़िदमत है ग़ज़ल
समझ वाले तो घर को स्वर्ग से सुंदर बना लेते
मगर नादान ; मंदिर हाथ से खंडहर बना लेते
जिन्हें दिलचस्पी होती-'आशियां ख़ुशहाल हो अपना'
वो मेहनत को धरम और फ़र्ज़ को मंतर बना लेते
भगत की भावना का मान ख़ुद भगवान रखते हैं
कहें गिरधर उसे हम पल में मुरलीधर बना लेते
कहां वो यक्ष , वो तड़पन मुहब्बत की कहां है अब
जो इक पानी भरे बादल को नामावर बना लेते
खुले आकाश नीचे धूप में मजदूर सो जाते
बना कर ईंट को तकिया ज़मीं बिस्तर बना लेते
हवेली में बड़े कमरे बहुत हैं जश्न की ख़ातिर
कभी रोने को तहख़ाना कोई तलघर बना लेते
नहीं रहते जहां में लोग हद दर्ज़े के जाहिल अब
जो हर चलते हुए को पीर-पैग़ंबर बना लेते
कहां ईमानदारों के बने हैं घरभरम है सब-
'ये मेहनत गांव में करते तो अपना घर बना लेते'
हुए शातिर बड़े औलादे-आदम ; रब भी हैरां है
जो मतलब से उसे अल्लाह औ ईश्वर बना लेते
ख़ुदा से क्या ग़रज़ इनको कहां भगवान से मतलब
फ़क़त तफ़्रीह को ये मस्जिदो-मंदिर बना लेते
कला के नाम पर जो हो रहा है घिन्न आती है
नहीं क्यों बेशरम खुल कर ही चकलाघर बना लेते
गिरेंगे गर्त में कितना , करेंगे पार हद कितनी
सियासतदां करेक्टर का कोई मीटर बना लेते
समाजो-रस्मो-रिश्ते लूट लेते , मार देते हैं
समझते वक़्त पर ; बचने को हम बंकर बना लेते
कमा लेते मियां मजनूं अगर इस दौर में होते
इशक़ के गुर सिखाने के लिए दफ़तर बना लेते
मुई महंगाई ने आटे का टिन भी कर दिया आधा
'सजन कहते-अजी , चावल चना अरहर बना लेते'
अहम्मीयत का अपनी उनको कुछ भी था न अंदाज़ा
ख़ुदा उनको , कई आशिक़ कई शायर बना लेते
सुना उनके हसीं हर राज़ से वाक़िफ़ है आईना
ख़ुदाया ! काश उसको यार या मुख़्बिर बना लेते
खनकती जब हंसी उनकी तो झरते फूल सोने के
अगर राजेन्द्र होते पास तो ज़ेवर बना लेते
-राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar
 तो आप लीजिए ग़ज़ल का आनंद …
इस बीच अपने समर्थन , प्रतिक्रिया , सहयोग, आशीर्वाद , उत्साहवर्द्धन से मुझे धन्य करने वाले समस्त् प्रियजनों के प्रति
हार्दिक आभार और शुभकामनाएं