आज प्रस्तुत है एक नज़्म

शिकस्तें
तेरे हिस्से का जितना हूं
पड़ा हूं मैं कहीं गिरवी…
ठहरना तुम
चुकानी चंद क़िस्तें और बाकी हैं !
ऐ मेरी हमनफ़स ! ऐ हमक़िरां !
मा’यूस मत होना
मेरी तक़्दीर में शायद शिकस्तें और बाकी हैं !!
अगरचे जल रही सीने में शम्अ तेरी उल्फ़त की
मगर तक़्दीर का बाज़ार लुट कर है अभी वीरां !
ख़ज़ाना तुम मुहब्बत का लिए’ आई हो घर मेरे
मगर …
दामन भी अपना खो चुका हूं हादसों में मैं
कहां रख पाऊंगा मह्फ़ूज़ तेरी मुस्कुराहट मैं ?
मेरी बग़िया के फूलों के भी जब के ज़र्द हैं चेहरे !
लहर ! लबरेज़ हो पाकीज़गी से तुम,
मगर … भोली !
कभी बुझती नहीं है तिश्नगी कुछ रेग़जारों की !
ज़माने भर की अग़्’यारी मेरेही साथ गुज़रेगी …
पता करता हूं मैं कितनी निशस्तें और बाकी हैं ?!
मेरी तक़्दीर में शायद शिकस्तें और बाकी हैं !!
शिकस्तें और बाकी हैं…
-राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar
हमनफ़स : मित्र
हमक़िरां : मुसाहिब/साथ बैठने वाला दोस्त
अग़्’यारी : प्रतिद्वंदिता/रक़ाबत/डाह/परायापन
निशस्त : बैठक/मज़्लिस/सभा
एक बार पुनः मैं हृदय से आभारी हूं
आप सब द्वारा मेरी मां के स्वास्थ्य के लिए की गई प्रार्थनाओं - दुआओं के लिए
मेरी माताजी पहले से बेहतर हैं
आपने मुझसे जितना स्नेह रखा है , उसके लिए कृतज्ञता के शब्द नहीं