ब्लॉग मित्र मंडली

14/5/11

कभी बुझती नहीं है तिश्नगी कुछ रेग़जारों की !



आज प्रस्तुत है एक नज़्म


शिकस्तें
तेरे हिस्से का जितना हूं
पड़ा हूं मैं कहीं गिरवी
ठहरना तुम

चुकानी चंद क़िस्तें और बाकी हैं !

ऐ मेरी हमनफ़स ! ऐ हमक़िरां !

मायूस मत होना

मेरी तक़्दीर में शायद शिकस्तें और बाकी हैं !!

अगरचे जल रही सीने में शम्अ तेरी उल्फ़त की

मगर तक़्दीर का बाज़ार लुट कर है अभी वीरां !

ख़ज़ाना तुम मुहब्बत का लिए’ आई हो घर मेरे

मगर 

दामन भी अपना खो चुका हूं हादसों में मैं

कहां रख पाऊंगा मह्फ़ूज़ तेरी मुस्कुराहट मैं ?

मेरी बग़िया के फूलों के भी जब के ज़र्द हैं चेहरे !

लहर ! लबरेज़ हो पाकीज़गी से तुम,

मगर … भोली !

कभी बुझती नहीं है तिश्नगी कुछ रेग़जारों की !

ज़माने भर की अग़्यारी मेरेही साथ गुज़रेगी 

पता करता हूं मैं कितनी निशस्तें और बाकी हैं ?!

मेरी तक़्दीर में शायद शिकस्तें और बाकी हैं !!

शिकस्तें और बाकी हैं

-राजेन्द्र स्वर्णकार

©copyright by : Rajendra Swarnkar


हमनफ़स : मित्र

हमक़िरां : मुसाहिब/साथ बैठने वाला दोस्त

अग़्यारी : प्रतिद्वंदिता/रक़ाबत/डाह/परायापन

निशस्त : बैठक/मज़्लिस/सभा
एक बार पुनः मैं हृदय से आभारी हूं
आप सब द्वारा मेरी मां के स्वास्थ्य के लिए की गई  प्रार्थनाओं - दुआओं के लिए
मेरी माताजी पहले से बेहतर हैं
आपने मुझसे जितना स्नेह रखा है , उसके लिए कृतज्ञता के शब्द नहीं





हार्दिक आभार !