ब्लॉग मित्र मंडली

18/8/11

मेरी ग़लती का नतीज़ा ; ये मेरी सरकार है


जबरन् बन गया मालिक ; जो चौकीदार है
काग़जी था शेर कल , अब भेड़िया ख़ूंख़्वार है
मेरी ग़लती का नतीज़ा ; ये मेरी सरकार है
सर से पा एहसांफ़रामोशी भरी है जिस्म में
 और हर इक रग़ भी इसकी शातिरो-मक्कार है
वोट से मेरे ही पुश्तें इसकी पलती हैं मगर
मुझपे ही गुर्राए ... हद दर्ज़े का ये गद्दार है
मेरी ख़िदमत के लिए मैंने बनाया ख़ुद इसे
घर का जबरन् बन गया मालिक ; जो चौकीदार है
छीनता मेरे निवाले , चूसता मेरा लहू 
कहता है अब जां मेरी लेने का यह हक़दार है
इसके दामन में मुझे देने की ख़ातिर है दग़ा
पास मेरे भी इसे देने को बस धिक्कार है
भ्रष्ट भी , निकृष्ट भी , हिटलर भी , तानाशाह भी
रूह कालिख में रंगी , इसका यही सिंगार है 
लपलपाती जीभ से तकता है मुझको आजकल
भेड़ियों-गिद्धों का आदम रूप में अवतार है
निभ सकी इससे न अब तक अपनी ज़िम्मेदारियां
चंद दिन में रुख़्सती का दिख रहा आसार है
सब तेरी मनमानियां सहलीं मगर सुन ! आज से
फ़ैसला करने को जनता हिंद की तैयार है
पूजना शैतान को राजेन्द्र मज़बूरी नहीं
वोट ज्यूं ही इस क़लम का भी अहम क़िरदार है
राजेन्द्र स्वर्णकार 
©copyright by : Rajendra Swarnkar


मित्रों ! हाथ में क़लम थाम रखी है तो निस्संदेह 
आपका दायित्व वर्तमान परिस्थितियों में और भी बढ़ा है । 
दलगत आस्था से हर हाल में ऊपर उठ कर ही 
ईमानदारी से न्याय की स्थापना के लिए
सोचने और निर्णय लेने का समय है ।



सबको सन्मति दे भगवान !