ब्लॉग मित्र मंडली

20/11/10

करुणा रस बरसाता चल !


मित्रों ! जीभ के स्वाद के लिए और धर्म के नाम पर की जा रही 
जीव-हत्या और मांसाहार पर पिछले दो-तीन दिन में 
हिंदी के कई विद्वान ब्लॉगर्स की बहुत विचारणीय पोस्ट्स पढ़ने में आईं ।

मुझे अपनी एक गीत रचना याद हो आई   
 करुणा रस बरसाता चल !

इस रचना को "करुणा… नाम से संस्था बनाए
कुछ लोग
बिना मेरी अनुमति-स्वीकृति के
अपनी निजि सम्पत्ति की तरह व्यापक स्तर पर
हज़ारों की संख्या में पुस्तक और ऑडियो रूप में भी
बलात् उपयोग में ले चुके हैं, अब भी ले रहे हैं ।

( यह अलग मुद्दा है, इस पर भी आपकी सम्मतियों के लिए निवेदन है )
प्रस्तुत है गीत
करुणा रस बरसाता चल !
तू करुणा रस बरसाता चल ! दुखियों को गले लगाता चल ! 
तू मिटा निराशा का कल्मष, आशा के दीप जलाता चल !! 

हैं भरे जगत में दीन-हीन, साधन-विहीन, श्रीहीन कई , 
मानव ! मानव का धर्म निभा; दीनों पर दया दिखाता चल !! 

मत दया दिखावे की कर; प्रतिफल की इच्छा तू कभी न कर ! 
जल बांट नदी ज्यूं, और पवन ज्यूं जन-जन को सहलाता चल !! 

असहाय, वृद्ध, निर्बल, निर्धन, भोले, रोगी, मा’सूम, विवश, 
सारे…ईश्वर की आस करें; ईश्वर का हाथ बंटाता चल !! 

करुणा है कोहेनूर ! अहिंसा आभूषण इंसानों का ! 
जीवन का दर्पण दया-धर्म ! दर्पण प्रतिपल उजलाता चल !! 

पर-जीवों के भक्षण से बढ़कर कृत्य नहीं वीभत्स कोई ! 
‘हिंसक न बनें, राक्षस न बनें’ – नासमझों को समझाता चल !! 

चहुंओर काल ! मानवता की फसलें उजड़ीं, जंगल उजड़े ! 
गुणियों के प्रेरक-पुष्पों से जीवन-बगिया महकाता चल !! 

की करुणा कृष्ण ने, अश्रु-बिंदु से धोए चरण सुदामा के; 
श्रीराम लगे उर केवट के; तू भी निज-दर्प भुलाता चल !! 

निज-कर्मों से मानवता के प्रतिमान् स्थापित कर जग में ! 
साक्षात् बुद्ध-महावीर के दर्शन निज-छबि में करवाता चल !! 

तू जीव-मात्र की सेवा में निष्काम समर्पित हो प्यारे ! 
दे दान दधीचि-सा जन-हित में; पुण्य-ध्वजा फहराता चल !! 

नानक ने जीवों पर करुणा का उच्चादर्श दिया हमको ! 
पर-पीड़ा-उन्मूलन-हित निज सुख की तू बलि चढ़ाता चल !! 

करुणा-वश शंकर विष पी’कर भी अमर हुए, महादेव हुए ! 
करुणा की महिमा अद्भुत ! करुणा हृदयंगम कर गाता चल !! 

- राजेन्द्र स्वर्णकार

 (c)copyright by : Rajendra Swarnkar

आप सबके स्नेह-सद्भाव-सहयोग-समर्थन हेतु हृदय से आभार !
आपके यहां मैं भी मन से निरंतर उपस्थित हूं ! 
बस कुछ दिन में हाज़िर होता हूं !
 विस्मृत न कर देना मुझे ! 


51 टिप्‍पणियां:

'साहिल' ने कहा…

राजेन्द्र जी, क्या खूब गीत है..............काश! सब लोग ऐसा ही करें.
शुभकामनाएं!

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

विश्व-मंगल की कामना सँजोये आपके इन स्वरों का संदेश संपूर्ण मानवता के लिए ग्रहणीय है .आपका अभिनन्दन!

Arvind Mishra ने कहा…

शाकाहार निश्चय ही सभ्य मानवता का लक्षण है ...बहुत सुन्दर भावमयी कविता !

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

sachmuch ek aisi rachna kee zaroorat thi ...aapki ghazal poori manushyata ko jagaane ki koshish karti hai ..aur manushya ki har komal samvedna ka ahwaan karti hai ..dili mubarakbaad... prashansha ke liye nahi ..atmsaat karne ke liye hai yah rachana..
:)

अमित शर्मा ने कहा…

करुणा रस बरसाता चल,...................अगर वास्तविकता में ही कोई आध्यात्मिक/धार्मिक होगा तो वह करुणा से भरा हुआ ही होगा.................नहीं तो आज अपनी ( सभी मानवों की ) दशा जाहिर है ही. हर जगह पत्थर्दिली का परिचय ही देते है

deepak saini ने कहा…

राजेन्द्र जी,
इस अतिउत्तम गीत ने दिल मे एक जोश सा भर दिया है
कौशिश करूगां इस गीत मे लिखी गयी किसी एक बात पर
भी अमल कर पाया तो जीवन धन्य हो जायेगा।

करूणा संस्था यदि सच मे भी दुसरो की मदद कर रही है
तो भी उसे आपकी अनुमति लेनी चाहिए थी।

केवल राम ने कहा…

वाह क्या बात है ..काश ऐसी भावना हर दिल में होती ..शुभकामनायें

मनोज कुमार ने कहा…

आपकी इस असाधारण कविता में संवेदना का विस्तार व्यापक रूप से देखा जा सकता है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
फ़ुरसत में .... सामा-चकेवा
विचार-शिक्षा

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

राजेन्द्र जी आपने अहिंसा पथ पर बढ़ने वालों को इस करुणा ग़ज़ल से प्रोत्साहन देकर मुझे हिम्मत दी.
"करुणा ही वास्तविक धर्म का मूल अंग है."
चरण वंदन करता हूँ. आपकी लेखनी को नमन.

मुझे अंदेशा है, शायद आपके ब्लॉग पर अब इंसानियत की खाल में लिपटे नकली इंसान नहीं आयें.

..

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बेहतरीन और लाजवाब रचना ... आपकी रचना की तारीफ मैं नहीं कर सकता ... इतना इल्म नहीं है मुझमें ... बस इतना कहता हूँ कि काश आपका थोडा सा भी गुण मुझमे आ जाए ...

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

..

आपके इस भाव यज्ञ में मेरी कविता का एक अंश आहुति रूप में :

"पर ना ज़िंदा
जनावर को मार
मुर्दा खा ना बन्दे,
कर परिंदे
बेफिकर."

..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरत सन्देश

दीपक डुडेजा DEEPAK DUDEJA ने कहा…

राजेन्द्र जी, गीत के माध्यम से खूबसूरत सन्देश दिया है आपने........ ठीक अपने रंग बिरंगे ब्लॉग कि तरह....

बढिया.

वन्दना ने कहा…

आपके इस गीत के माध्यम से ऐसे ही भाव हर दिल मे अंकुरित हों यही कामना करती हूँ।

sada ने कहा…

सर्वप्रथम इस गीत के लिये बधाई ...इसका हर शब्‍द जाने कितने संदेश लिये, हर पंक्ति करूणा का सागर ज्‍यों, भावमय करती यह अनुपम रचना प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

सुज्ञ ने कहा…

राजेन्द्र जी,
आज लेखनी करूणा-रस से सराबोर है, स्तुति करता हूँ आपकी लेखनी की।

यह गीत इतना भाव प्रवण है कि उर में करूणा प्रवाहित होने लगती है, एसे कवि ही जग में दया का प्रसार करनें में समर्थ है।

जिन किसी ने इस रचना का अनधिकार उपभोग किया, अनुचित है। किन्तु आप हर्ष मनाएं, आपके पुण्यों का उपार्जन-प्रसार हो रहा है।

Anita ने कहा…

भाव भरी इस सुंदर कविता के लिये बधाई !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

करुना का सागर उमड़ रहा है हर पंक्ति में ... बहुत ही लाजवाब राजेन्द्र जी ... नमन है आपकी लेखनी को ..

अनुपमा पाठक ने कहा…

सुन्दर भावपूर्ण रचना!

नीरज गोस्वामी ने कहा…

शाकाहार और मांसाहार दोनों ही दुनिया में प्रयोग लाये जाते हैं....किसी को मार कर खाना जघन्य अपराध की श्रेणी में क्यूँ आता है जबकि प्रकृति हमें ये ही सिखाती है...आप गौर से देखें सकल पृथ्वी पर एक प्राणी दूसरे को अपना आहार बनाते हैं...इस नियम से जल थल और नभ में विचरण करने वाले सभी आ जाते हैं उनमें इंसान भी एक है...अब अगर शेर खरगोश को खाए तो सही और इंसान खरगोश को खाए तो गलत...ये बात सही नहीं है...दुनिया में अधिकांश जनसँख्या मांसाहार करने वालों की है कारण ये है के हम वो ही खाते हैं जो हमें सुविधा से उपलब्बध होता है...समुद्र या जलाशयों के आस पास रहने वालों के लिए जल जीवन सबसे आसानी से उपलब्द्ध आहार है इसलिए वो उसे खाते हैं, जहाँ धान गेहूं नहीं उगता वहां लोग मांस खाते हैं...ठन्डे मुल्कों के लोग गर्मी प्राप्त करने के लिए मांसाहार करते हैं...क्यूँ की जानवरों में चर्बी अधिक मिलती है...

इंसान भी एक जानवर ही है, उसकी भी हिंसक प्रवृति होती ही है...जरूरी नहीं के मांसाहार करने वाले लोग क्रूर हों और शाकाहारी नरम दिल के हों...हमारे संस्कार हमें दूसरों को मार कर खाने की अनुमति नहीं देते लेकिन जिनके देते हैं वो खाते हैं इसमें कोई बुराई नहीं है...मांसाहारी अभी तो पैदा हुए नहीं जब से ये दुनिया बनी है लोग दूसरे जानवरों को मार कर खाते हैं...अगर मांसाहार पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया जाए तो शायद दुनिया के तीन चौथाई से अधिक लोग भूखे मर जायेंगे...खैर ये तो बहस का विषय है.

आप की रचना हमेशा की तरह विलक्षण और प्रेरक है. लिखते रहें.

नीरज

नीरज गोस्वामी ने कहा…

शाकाहार और मांसाहार दोनों ही दुनिया में प्रयोग लाये जाते हैं....किसी को मार कर खाना जघन्य अपराध की श्रेणी में क्यूँ आता है जबकि प्रकृति हमें ये ही सिखाती है...आप गौर से देखें सकल पृथ्वी पर एक प्राणी दूसरे को अपना आहार बनाते हैं...इस नियम से जल थल और नभ में विचरण करने वाले सभी आ जाते हैं उनमें इंसान भी एक है...अब अगर शेर खरगोश को खाए तो सही और इंसान खरगोश को खाए तो गलत...ये बात सही नहीं है...दुनिया में अधिकांश जनसँख्या मांसाहार करने वालों की है कारण ये है के हम वो ही खाते हैं जो हमें सुविधा से उपलब्बध होता है...समुद्र या जलाशयों के आस पास रहने वालों के लिए जल जीवन सबसे आसानी से उपलब्द्ध आहार है इसलिए वो उसे खाते हैं, जहाँ धान गेहूं नहीं उगता वहां लोग मांस खाते हैं...ठन्डे मुल्कों के लोग गर्मी प्राप्त करने के लिए मांसाहार करते हैं...क्यूँ की जानवरों में चर्बी अधिक मिलती है...

इंसान भी एक जानवर ही है, उसकी भी हिंसक प्रवृति होती ही है...जरूरी नहीं के मांसाहार करने वाले लोग क्रूर हों और शाकाहारी नरम दिल के हों...हमारे संस्कार हमें दूसरों को मार कर खाने की अनुमति नहीं देते लेकिन जिनके देते हैं वो खाते हैं इसमें कोई बुराई नहीं है...मांसाहारी अभी तो पैदा हुए नहीं जब से ये दुनिया बनी है लोग दूसरे जानवरों को मार कर खाते हैं...अगर मांसाहार पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया जाए तो शायद दुनिया के तीन चौथाई से अधिक लोग भूखे मर जायेंगे...खैर ये तो बहस का विषय है.

आप की रचना हमेशा की तरह विलक्षण और प्रेरक है. लिखते रहें.

नीरज

उपेन्द्र ने कहा…

sunder prastuti......

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) ने कहा…

सुन्दर और भावपूर्ण रचना के लिए बधाई|

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हृदयोद्गारित निवेदन।

Asha ने कहा…

बहुत सुन्दा ढंग से प्रस्तुत किये हें भाव |
मनको छूती रचना के लिए बधाई |
आशा

दीप्ति शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर तरीके से कहा गया गीत जो जीवन की सच्चाई दिखाता है
बहुत सुंदर

www.deepti09sharma.blogspot.com

monali ने कहा…

Very thoughtful.. agar ise padh k koi bhi maansahaar chhodne ko prerit ho to behad sarthak bhi ..

क्षितिजा .... ने कहा…

देरी से आने के लिए माफ़ी चाहती हूँ राजेंद्र जी ...

आज आपकी इस रचना को पढ़ कर शब्द नहीं मिल रहे ... इतने ही कहूँगी की यदि इस रचना का कोई एक अंश भी अपने व्यक्तित्व में अपनाता है ... तो वो मानव होने के बहुत करीब पहुँच जायेगा ... पढ़ कर एक सुकून सा महसूस किया ... आभार आपका ...

शरद कोकास ने कहा…

करुणा हो तो बुद्ध की करुणा जैसी हो ।

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

बहुत अच्छी रचना है......करुणा और शाकाहार पर इससे अच्छा क्या लिखा जायेगा..?करुणा संस्था अगर ऐसा कर रही है तो गलत है....कम से कम श्रेय तो देना ही चाहिए..

Pradeep ने कहा…

आदरणीय राजेंद्र जी .....प्रणाम !
'ईश्वर का हाथ बंटाता चल .......'
हर पंक्ति अनुकरणीय और प्रेरक ........इस रचना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.......
करुणा संस्था यदि सचमुच इस गीत की शिक्षाओं को मानती है ...तो अनुमति ना लेना बहुत निंदनीय है.....
ये "बलात " कुछ समझ नहीं आया ....क्या यहाँ चोरी-सीनाजोरी वाली बात है......अगर ऐसा है तो आपको भी अपने अधिकारों का प्रयोग अवश्य करना चाहिए.....
मेरे ब्लॉग पर आने और उत्साह बढ़ाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

भाई राजेन्द्र स्वर्णकार जी!
आपकी यह रचना बहुत ही प्रेणाभरी और करुणा की महिमा को उदघाटित हुई है! इसे चुराने को तो सभी का मन करता है!
--
आखिर करुणा जो है इसमें!
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रचना देने में कोई आपत्ति किसी भी रचनाधर्मी को नही होती मगर इसके लिए रचनाकार की अनुमति लेनी आवश्यक होती है!
--
आप संतुलित लिखते हैं और सटीक-सार्थक शब्दों का प्रयोग करते हैं!
मेरी शुभकामएँ स्वीकार करें!

ALOK KHARE ने कहा…

ek manviye geet, sundar prastutui

गीता पंडित (शमा) ने कहा…

आभार...आपके सार्थक और सुंदर शब्दों के लियें....

पहली बार आपके ब्लॉग पर आयी हूँ..
अच्छा लगा इस मंच पर आप जैसे कवि भी उपस्थित हैं...

नई कविता तो आसानी से दिख जाती है...लेकिन छंद...गाहे बगाहे दिखाई देता है...
आज दिखा तो बांछें खिल गयीं....आभार...
सुंदर ब्लॉग और मन भावन रचनाएं.........

शुभ-कामनाएँ
गीता पंडित

विरेन्द्र सिंह चौहान ने कहा…

आप ने इतनी बढ़िया रचना लिखी है कि मैं सोच रहा हूँ इससे पहले मैं आप के ब्लॉग पर क्यों नहीं आया?
आपके ब्लॉग पर आकर बहुत अच्छा लगा. आपकी इस रचना के लिए आपको बधाई और ढेरों शुभकामनाएँ.

abhishek ने कहा…

bahut sunder ..

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

ahinsa aur paropkar ka sandesh denewali karunabhav bhari rachna .
manav jeevan ko sarthak prerna deti hai.

रंजना ने कहा…

कल्याणकारी निर्मल भाव , अतिसुन्दर अभिव्यक्ति !!!

मैं भी मानती हूँ कि रक्त मांस मज्जा वाले जिस जीव को मैं जीवन दे नहीं सकती उसका जीवन लेने से बड़ा पाप और कुछ भी नहीं और उसमे भी जीभ के स्वाद के लिए किया गया रक्तपात,हत्या...ओह !!! कभी धर्म नहीं हो सकता,चाहे जिस किसी भी धर्म में इसे सही ठहराया जाय...

anjana ने कहा…

आप बहुत ही अच्छा लिखते है । आप कितने सुन्दर शब्दो का चयन करते है जिस के फलस्वरुप रचना मे चार चांद लग जाते है और मुंह से निकलता है वाह !क्या खूब लिखा है.....

सतीश सक्सेना ने कहा…

स्नेही राजेंद्र !!
शुभकामनायें

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत अच्छी रचना, सन्देश देती हुई, बधाई

निर्मला कपिला ने कहा…

राजेन्द्र जी आपका ये गीत एक कालजयी रचना है भला चोर तो छोटी से छोटी रचना नही छोडते तो आपका गीत क्यों चोरी न हो? लाजवाब गीत के लिये बधाई

अल्पना वर्मा ने कहा…

मानव कल्याण हेतु निवेदन इस गीत में बहुत ही खूबसूरती से किया गया है.
गीत आप की ऊँची और सकारात्मक सोच दर्शाता है.
अति सुन्दर प्रस्तुति.

JHAROKHA ने कहा…

bahut hi samvedana se bhari ek gahari bhao -pravan prastuti.aapki lekhni se bahut hi prabhavit hun.
ek ek panktiyan apne peechhe ek adbhut sandesh chhon jaati hain.ek maje hue kalakaar ki sashkt rachna.
poonam

ZEAL ने कहा…

.

इस सुन्दर सन्देश देती हुई रचना के लिए आभार ।

.

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar ने कहा…

भाई राजेन्द्र जी,
नमस्कारम्‌!
इस बार देर से आ पाया हूँ! ख़ैर...!

मानव-हृदय का सहज एवं भावपूर्ण उच्छलन है यह रचना! इसे पढ़कर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की रचना स्मृति में कौंध गयी-

"लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गीत प्रेम के गाता चल।
नम होगी यह मिट्‍टी ज़रूर, आँसू के कण बरसाता चल।"

आपके डिक्शन पर मुग्ध हूँ...बधाई!

girish pankaj ने कहा…

prerak geet hai. agar kisi sansthaa ko yah pasanda aaya to achchhi baat hai. yah hamari safalata hai. lekin sansthaa ko lekhak se sahamati zaroor lenee chahiye.

वीना ने कहा…

बहुत सुंदर है...मानवता का संदेश...जिसमें थोड़ी भी इंसानियत बाकी होगी वह करुणा रस जरूर बरसाएगा....बधाई खूबसूरत रचना के लिए

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

सुन्दर भाव, सुन्दर रचना!
करुणा ही तो हमें हैवानों से अलग करती है।

shilpa mehta ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना, लिंक के लिए आपका बहुत आभार |

क्या कभी हम सुधरेंगे ??? आज मन बहुत उदास है - आज बकरीद थी | मालिक के साथ ( विश्वास पूर्वक ) मूक बकरों को शांत चेहरों से जाते देख रही हूँ पिछले हफ्ते भर से | मन रोता है - कि यह मूक पशु जिस मालिक से प्रेम और रक्षा का भरोसा लिए चल रहा है ----- वही मालिक ना सिर्फ इसे काटेगा, बल्कि तडपा तडपा कर काटेगा, फिर इसे पकाएगा, फिर स्वाद लेकर खायेगा भी |

आज खाना भी न खाया गया दोनों समय - बस रोना आता रहा पूरे दिन | :( कब बदलेगा यह सब ? बदलेगा भी - या नहीं कभी ?

Rakesh Kumar ने कहा…

शिल्पा बहिन के पोस्ट से आपकी इस पोस्ट पर आना हुआ.बहुत ही मार्मिक व हृदयस्पर्शी
रचना है आपकी.अनुपम हृदयस्पर्शी रचना
के लिए दिल से आभार,राजेन्द्र जी.