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19/1/11

चली चवन्नी ठाठ से !


केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा 20 दिसंबर 2010 को जारी अधिसूचना के अनुसार 30 जून 2011 से 
25 पैसे और इससे कम मूल्य के सभी  सिक्कों को चलन से वापस ले लिया जाएगा।
तो क्या अब तक ठाठ से चलती आ रही चवन्नियों के माई-बाप करमफ़र्मा आक़ाओं की इतनी नहीं चलेगी कि वे पूर्ववत चवन्नियों को चला सकें ?!

आप सोच रहे होंगे कि बात क्या है … है ना ?
तो सुनिए, अभी महीना है जनवरी ,
और हर महीने की तरह इस महीने में भी आती है 26 तारीख ।
…और 26 जनवरी को
ग़ुलाम मानसिकता वाले आज़ाद भारत का होता है गणतंत्र दिवस !
और इस अवसर पर शहर शहर, नगर नगर में 
प्रशासन द्वारा बांटी जाती हैं कला, साहित्य आदि के नाम पर  रेवड़ियां !
बांटी क्या जाती हैं जी,
कुछ काइयां किस्म के अवसरवादी छद्म सृजक  उकसा देते हैं सरकार को, 
और ख़ुद निर्णायक पंच बन कर 
गुणीजनों की गर्दनें काटने की क़ीमत पर 
असली हक़दारों के पेट पर लात और पीठ में गंडासा मार कर
जातिवाद के आधार पर लॉबिंग करके
अपने टटपुंजिया चेलों चमाटों को इतराने के अवसर उपलब्ध करवाते हैं ।
सरेआम इंसानियत के ख़ून का यह भी एक मौका होता है, 
जब ज़ल्लादों की परमानेंट पीढ़ी टेम्परेरी रूप से 
इंसाफ़ को सूली पर लटकाने का सार्वजनिक प्रदर्शन करती है !
गांठ के पूरे और आंख के अंधे से कुछ पाना ज़्यादा मुश्किल भी नहीं होता …। 
और प्रशासन के ही पास आंखें होती तो
अन्य बहुत सारी बातों के साथ  
हमेशा ज़्यादातर ग़लत लोग ही पुरस्कार और मान-सम्मान के हक़दार नहीं बनते !

* तो जनवरी है जी सेलिब्रेशन का महीना *
सरकार के लिए ! अवसरवादी छलछंदी छद्म लोगों के लिए ! टटपुंजियों के लिए !

…तो सरस्वती की वरद संतान भी क्यों न सेलिब्रेट करे 26 जनवरी की पूर्व वेला… 
 ?  !  ?
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आप यक़ीन मानें
अभी रात ( 1:57 ) एक बज कर सत्तावन मिनट पर
यह आलेख लिखते समय
धरती माता ने तड़प कर करवट बदल कर 
( भूकम्प )
इस अन्यायपूर्ण शर्मनाक स्थिति की पीड़ा की पुष्टि में
अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई है ।
* जय हो !*
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आइए, एक गीत का आनन्द लिया जाए

चली चवन्नी ठाठ से !

सुन कर चकित हुए कितने ; कुछ उछल गिर पड़े खाट से !
सौ का नोट नहीं चल पाया चली चवन्नी ठाठ से !!
फिर चली चवन्नी ठाठ से …

तोल किया छलियों ने फिर से खोटे तकड़ी बाट से !
नये नाम से ख़बर पुरानी, निकली अंध कपाट से !!
फिर चली चवन्नी ठाठ से …

लहराते घुंघराले संवरे केश रहे अनदेखे ही,
रींझे नव अवतार सूर के, बस… गंजी खल्वाट से !! 
फिर चली चवन्नी ठाठ से…

दुराग्रही बादाम के हलवे को बेदम बकवास कहे
स्वाद उन्हें मिलता है खट्टी राब से, बासी घाट से !!
फिर चली चवन्नी ठाठ से …

मखमल रेशम मलमल तो औक़ात समझ से बाहर हैं
मिले रगड़ते वे सिर अपने घास जूट से, टाट से !!
फिर चली चवन्नी ठाठ से …

ख़रे माल की क़ीमत क्या दे… माद्दा नहीं परखने का
पाट सके कब भाट पाठ कर फ़र्क़ साठ का आठ से ?!
फिर चली चवन्नी ठाठ से …

राजहंस राजेन्द्र दूर से काग गिद्ध लीला देखे
ईमां बिकता; आस किसे उस टुच्ची मंडी हाट से ?!
फिर चली चवन्नी ठाठ से …
- राजेन्द्र स्वर्णकार
(c)copyright by : Rajendra Swarnkar

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आप मेरे समर्थक स्नेहीजन अब 200 से अधिक हैं ।
अभिभूत हूं मुझ पर आपके विश्वास को महसूस करके !
आभारी हूं मेरे प्रति आपके स्नेह के लिए !

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तो आज इतना ही
मिलते हैं 26 जनवरी के आस-पास  
Take Care

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58 टिप्‍पणियां:

Rahul Singh ने कहा…

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं.

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

very nice bhai rajendraji badhai

Rahul Singh ने कहा…

पुनश्‍चः 26 जनवरी के प्रसंग पर आपकी तल्‍खी शोचनीय और चिंताजनक है.

सोमेश सक्सेना ने कहा…

वाह राजेँद्र जी गीत मस्त है। आपका चिंतन भी सही है। बधाई।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

वह दिन दूर नहीं है भइया,
खो जाएगा एक टका!
जैसे डाली से गिर जाता,
अनायस ही आम पका!
--
अब तो कागज का एक और दो रुपये का नोट भी नजर नहीं आता है!
--
आपकी रचना बहुत सार्थक रही और सन्देश दे गई कि अभी महँगाई और बढ़ेगी!

सतीश सक्सेना ने कहा…

सही दर्द उभारा है आपने इस लेख में ! यहाँ ईमानदारी और सौम्यता की कोई क़द्र नहीं ....
शुभकामनायें राजेंद्र भाई !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चिन्ता जायज़ है ..बढ़िया कटाक्ष है रचना में ..

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

सही कहा है आपने

ईमान बिकते हैं
पुरस्कार बिकते है
सरे आम बिकते है
सुबह शाम बिकते है..

और चव्वनी.. पर बहुत कडुवा सत्य लिखा है...
सादर

नीरज गोस्वामी ने कहा…

कला के सच्चे उपासक किसी पुरूस्कार की कामना में नहीं लिखते...लेखक वो है जो अपने लिए लिखे...कबीर दास जी ने दोहे क्या दुनिया के लिए लिखे थे? उन्हें तो शायद पता भी नहीं होगा के एक दिन दुनिया उन्हें गाएगी...पूजेगी...मीरा क्या दर्शकों के लिए भजन गाती थी? जो बाद में जन जन के मुंह पर सज गए...तुलसीदास जी ने क्या कभी सोचा था की रामायण की प्रतियाँ घर घर में होंगी और पूजी जाएगी...ये सब स्वान्त सुखाय के लिए सृजन करते थे और तभी जन जन के दिलों में घर कर गए...गणतंत्र दिवस पर पुरुस्कृत लोगों को कौन कितना याद रखता है हम सब जानते हैं...इन पुरुस्कारों की कोई अहमियत नहीं है...आप सृजन करते रहें दुनिया एक दिन अपने आप आपको पूजेगी...
चव्वनी वाली रचना अप्रतिम लगी...लिखते रहें...

नीरज

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut badhiyaa

एस.एम.मासूम ने कहा…

ईमान बिकते है , किरदार भी बिकते हैं. और सब से अधिक आश्चर्य तो यह कि पैसे कि शान पे इंसान बिकते हैं.

sada ने कहा…

चवन्‍नी पर कड़वी सच्‍चाई से लिखा गया यह आलेखन विचारणीय है ..सुन्‍दर लेखन के लिये बधाई ।

रचना दीक्षित ने कहा…

क्या बात है!!!!!मज़ा आ गया. अभी चवन्नी चलने दीजिये जितनी चलती है. फिर रूपये में तीन अठन्नी भी तो भुनानी हैं.

deepak saini ने कहा…

फिर चली चव्वननी ठाठ से
सर जी ये चव्वननी तो दौड रही है
सुन्दर रचना

दिगम्बर नासवा ने कहा…

लाजवाब मस्ती भरा गीत .... साथ साथ सार्थक चिंतन .... गंभीर चिंतन .... २६ जनवरी की शुभ-कामनाएं .....

Akhil ने कहा…

sarthak rachna...sarthak lekhan..

shikha varshney ने कहा…

बस ऐसा ही है क्या कर सकते हैं ..और यह स्थिति हर जगह ही है.
मस्त गीत है.

सुज्ञ ने कहा…

वाकई यह बौनी चवन्नीयां ठाठ से चलती है।
यह व्यवस्था और मान्यताओं पर तीव्र कटाक्ष है।

कविता रावत ने कहा…

bahut badiya prastuti..

अल्पना वर्मा ने कहा…

बढ़िया गीत...तीखापन लिए सटीक.
२६ जनवरी एक और दिन 'सेलीब्रेशन 'का..

आप ने सही लिखा 'आँख के अंधे गाँठ के पूरे' से कुछ पाना ज्यादा मुश्किल भी नहीं होते

vinod saraswat ने कहा…

राजेन्दर जी, आपने ठा है के म्हे इण भांत पुरस्कार कबाड्निया रो बेरी {विरोधी} हूँ. आप आपरे गीत मे इण लोगा ने सागीड़ा लबडधके लिया है, आप तो बट काढ दिया. इण सारु आपने घना-घना रंग ने लखदाद.

POOJA... ने कहा…

वाह, क्या कटाक्ष किया है... अति सुन्दर...
चवन्नी तो चली ही जाएगी...
हम २६ को आयेंगें...

डॉ. दलसिंगार यादव ने कहा…

चवन्नी पर रोना ठीक नहीं है। इससे पहले भी तो कितने सिक्के सामान्य प्रचलन से बाहर हो चुके हैं। अधेला, डब्बल, छेदहवा पइसा, अधन्नी, इकन्नी, दुअन्नी आदि। वैसे भी आजकल तो दुकानदार अठन्नी भी नहीं लेना पसंद करते हैं। यही हस्र है छोटे नोटों का भी। अतः प्रसन्न होइए कि आप बहुत तरक्की कर रहे हैं।

ehsas ने कहा…

ईमानदारी ये कौन सी चिड़िया का नाम है। इसको विलुप्त हुए तो जमाना गुजर गया।
सुन्दर व्यंग्य।

Bhushan ने कहा…

बढ़िया शैली और बढ़िया व्यंग.

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर बात कही आप ने २६ जनवरी पर, चबन्नी बेचारी को देखे सदिया हो गई, यह तो पहले ही नही दिखती थी, यह क्या इस से छोटे पेसे भी नही मिलते थे, अब बंद हो गई ? हमे तीन पेसे मिलते थे जेब खर्च के, ओर जिस मे से हम बहुत कुछ खाते थे, एक सप्ताह के तीन पेसे? चबन्नी वाला कितना अमीर होगा?

S.M.HABIB ने कहा…

जय हो. जयहिंद. जय गणतंत्र.

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

चवन्नी का दर्द ( यानि जो हासिये पर चली गयी ) इन पंक्तियों में बखूबी उभरा है....... सुंदर प्रस्तुति.

Harman ने कहा…

good blog..... nice posting

visit my blog plz

Lyrics Mantra
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boletobindas ने कहा…

वाह बिरादर क्या बात है। चवन्नी चली ठाठ से। मेरे ब्लॉग पर जो कविता लिखी है उसे पढ़कर दिल तो खुश हुआ ही था कि अब तो ये पढ़कर बाग बाग हो गया। क्या कहने। पूरी तरह से सहमत हूं। वैसे ये क्या गजब संयोग है कि जब मैं पोस्ट लिख रहा था तो आप भी लिख रहे थे। पर मेरे को धरती के हिलने का पता ही नहीं चला..पोस्ट लिखने के बाद नेट से जानकारी मिली.....सुबह पता चला कि दिल्ली में लोग रात में घर के बाहर आ गए थे.....क्या कहने....

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

वाह,बहुत बढ़िया कटाक्ष है !

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

आदरणीय राजेन्द्र जी ,
सप्रेम अभिवादन !
सर्वप्रथम तो आपका लेख बहुत ही हनकदार है | बखिया उधेड़ कर रख दी आपने !
...................
और फिर चवन्नी वाला गीत ..क्या कहना !
चवन्नी की कीमत हज़ार के नोट से भी कहीं ज्यादा सिद्ध होती है ,'राजा दिल मांगें चवन्नी उछाल के '
बहुत-बहुत आभार |

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

राजेन्‍द्र जी, आपकी लेखनी और प्रस्‍तुतिकरण दोनों का जवाब नहीं। इस शानदार पोस्‍ट के लिए बधाई स्‍वीकारें।

---------
ज्‍योतिष,अंकविद्या,हस्‍तरेख,टोना-टोटका।
सांपों को दूध पिलाना पुण्‍य का काम है ?

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

चवन्नी का जीवन हो चला, वह चली ठाठ की चाल।

राजीव थेपड़ा ने कहा…

vaah bhaayi raajendra.....!!!

mahendra verma ने कहा…

ऐसी चवन्नी तो चलती ही रहेगी।
बढ़िया व्यंग्य।

aman agarwal "marwari" ने कहा…

म्हारे को थारी रचना घनी चौखी लगी से. भाई जी आप म्हारे ब्लॉग मे आये थार घणा शुक्रिया. भाई जी म्हारा जन्म खटीमा (उत्तराखंड) मे हुआ है. मगर मेरे पूर्वज सभी राजस्थान के सीकर जिले के बाबा श्याम की नगरी खाटू के पास मवंदा नाम के गाँव के है. मुझे मेरे मारवाड़ी होने पर गर्व है इसलिए अपना उपनाम मारवाड़ी लिखता हू रही बात मारवाड़ी बोलने और समझने की तोह उस मामले मे मैं बहुत कच्चा हू. मतलब म्हारे को टूटती फूटती मारवारी आवे से. घनी चौखी मारवारी कोणी आवे.

भाई जी आपका मेरे ब्लॉग मे आना मेरे लिए उर्जा का कार्य साबित हुआ जब मैंने देखा था की मेरे ब्लॉग मे न तो समर्थक है और न ही कोई टिपण्णी आती है तो मे बहुत ही निराश हुआ एवं अपने दोनों ब्लॉग को बंद करने का निर्णय लिया मगर कल एकसाथ इतने अच्छे अच्छे कमेन्ट आये तो मन को ख़ुशी मिली.

पुनः हार्दिक सुभ्कम्नायो के साथ आपके जबाब के इंतजार मे
- अमन अग्रवाल "मारवाड़ी"

खाटू नरेश की जय
लीले के स्वर की जय.
तीन बाण धरी की जय

Surendra Kumar ने कहा…

thanks for chavni good writing.26 Jan.

' मिसिर' ने कहा…

राजेन्द्र जी मुझे आपकी कविता से अधिक उसके पूर्व लिखी भूमिका ने अधिक प्रभावित किया !
लेकिन इसका यह अर्थ नहीं की कविता किसी प्रकार कम है ,यह भी बहुत अच्छी है !

' मिसिर' ने कहा…

राजेन्द्र जी मुझे आपकी कविता से अधिक उसके पूर्व लिखी भूमिका ने अधिक प्रभावित किया !
लेकिन इसका यह अर्थ नहीं की कविता किसी प्रकार कम है ,यह भी बहुत अच्छी है !

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

चवन्‍नी से गणतंत्र की ओर बढ़ना कई सख्‍त सच्‍चाईयां उकेर गया है, उधेड़ रहा है हिन्‍दी से करते हैं प्‍यार तो शनिवार को रहें तैयार

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

आद.राजेंद्र जी,
आपकी चवन्नी की कविता बेशकीमती है !
वर्तमान दौर की जो तस्वीर आपने शब्द पटल पर उकेरा है उसके लिए आपकी जितनी भी तारीफ़ की जाय कम है !
बड़ी आग है आपकी कलम में !
मेरी शुभकामनाएं

रंजना ने कहा…

एक एक शब्द हमारे मन की कह दी aapne और वह भी इतने व्यवस्थित और प्रभावशाली ढंग se कि....वाह !!!
आभारी हैं हम आपके....
और रचना की तो क्या कहूँ...अद्वितीय,अनुपम !!!

मन मुग्ध कर लिया आपकी प्रस्तुति ने...

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

बहुत खूब ! सुन्दर लाजबाब !

अब तो बस यही कहूंगा, बेचारी चवन्नी !!

amrendra "amar" ने कहा…

karara vyangya.....wakai kabile tarif

http://amrendra-shukla.blogspot.com

तिलक राज कपूर ने कहा…

चलिये अब चवन्‍नी चलना बंद हो रहा है, अब आपको भविष्‍य में चवन्नियों का सामना नहीं करना पड़ेगा। साहित्‍य जगत में स्‍वयं को मिटा कर ही कबीर और मीरा हुआ जा सकता है। टैगोर, मुंशी प्रेमचंद, निराला, मैथिलीशरण गुप्‍त, हरिवंश राय बच्‍चन इत्‍यादि अनेकानेक साहित्‍यकारों को कितने पुरस्‍कार मिले इसमें आज किसी को कोई रुचि नहीं है, उनकी रचनायें बोलती हैं।
बीते हुए कल को आज के संदर्भ में देखें तो कुछ बदला नहीं है, उस समय भी चवन्‍नी व्‍यवस्‍था रही होगी लेकिन आज उनका नाम भी देखने को नहीं मिलता, चवन्नियॉं अपने देहावसान के साथ दफ़्न हो जाती हैं, कुंदन साहित्‍य जीवित रहता है और महत्‍व साहित्‍य का ही होता है साहित्‍यकार तो उसका निमित्‍त भर रहा होता है।
आप अछा लिखते हैं, उसपर केन्द्रित रहें। शान्ति और आनंद भाव सरस्‍वती-पुत्र के आवश्‍यक गुण हैं। इतना तल्‍ख़ नहीं होना चाहिये कि हमारा मूल सृजन स्‍वभाव प्रभावित होने लगे। कड़ुवाहट बह जाने दें जैसे किसी फ़ोड़े से मवाद। आनंद के साथ के जियें। आनंद भाव ईश्‍वर की सच्‍ची आराधना है।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

भाई राजेन्द्र जी ,
सप्रेम अभिवादन !
आपने मेरे ब्लाग पर आकर जो अनमोल विचार व्यक्त किया |
बहुत-बहुत आभार !

आपने मेरे उपनाम 'झंझट' के बारे में जो लिखा है , मैं पूर्णतः सहमत हूँ |
१९८०-८४ के बीच मैं एक साप्ताहिक पत्र 'सत्य भारत ' का प्रबंध संपादक था साथ ही साथ समसामयिक सामाजिक परिवेश पर एक व्यंग्य स्तम्भ 'झंझट' भी लिखता था | उस समय कवि मंचों पर हास्य व्यंग्य रचनाएँ भी पढता था | बस तभी से यह उपनाम कब मेरे नाम के साथ चिपक गया , मैं जान ही नहीं पाया | तभी से इसे ढो रहा हूँ | आपही की तरह कई शुभचिंतक एवं मित्र रचनाकारों ने बहुत बार मुझसे यही सवाल किया , सुझाव भी दिए किन्तु यह 'झंझट ' दूर न हो सका |
आप कुछ ऐसा तरीका बताएं जिससे 'ब्लाग जगत' में इसे दूर कर सकूँ |
बहुत-बहुत धन्यवाद |

Arvind Mishra ने कहा…

परिदृश्य तो सचमुच ऐसा ही है मगर हिम्मत न हारिये बिसारिये न सीताराम!

girish pankaj ने कहा…

chavanni kee shaan ka varnan karate huye sundar- vyangyatmak-kavy parh kar aanan aa gay. kisi ne to cavanni ko mahatv diya.

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा…

tikha , chutila vyang. bhut achche.
meenakshi swami. Indore.

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा…

tikha , chutila vyang. bhut achche.
meenakshi swami. Indore.

Mansoor Ali ने कहा…

"सुन कर चकित हुए कितने;कुछ उछल गिर पड़े खाट से
सौ का नोट नही चल पाया चली चवन्नी ठाठ से
फिर चली चवन्नी ठाठ से."

चवन्नी की महिमा ख़ूब बयान की, विदा होती हुई चवन्नी को इससे अच्छी श्रद्धांजली क्या हो सकती है.
-- mansoorali हाश्मी
http://aatm-manthan.com

निर्मला कपिला ने कहा…

चवन्नी तो चलेगी या नही मगर राजेन्द्र भाई की ये रचना खूब ठाठ से चलेगी। बहुत ीअच्छा लगा ये गीत बधाई।

इमरान अंसारी ने कहा…

राजेंद्र जी,

जज़्बात पर आपकी टिप्पणी का तहेदिल से शुक्रिया......आपने शुरू में जो कटाक्ष कियें हैं वो बहुत ही बढ़िया लगे.......बहुत सुन्दर पोस्ट है .....शुभकामनायें आपको....

honesty project democracy ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रेरक प्रस्तुती......शानदार.........हो सके तो भ्रष्टाचार के खिलाप जनयुद्ध में 30 जनवरी 2011 को दिल्ली के रामलीला मैदान में अपने दोस्तों और सहयोगियों के साथ जरूर भाग लें.....या अपने शहर में ही इस तरह के मार्च का आयोजन करें ३० जनवरी को .....

ज्योति सिंह ने कहा…

chaliye chwanni ki izaat to badhi ,ati uttam rachna .badhai sweekare .

Devi Nangrani ने कहा…

Rajendraji
saadr namaskar aur Gantantra Diwas ki shubhkamnayein
aapki site par jakar kuchh paye bina laut aana namumkin hai.

Mom ki tarah pighal jaonga. suni.

bahut hi acchi lai ..

aap gayi hui post ka ek sankalan banayein isi Blog par jahan jab chahe purani ghazals ko bhi suna ja sake.
bahut hi acchi awaaz hai. Sur bhi pakke hai.
Gayki aapke ander se phoot nikalti hai. aur shayad yahi jeevan ko sanwarti hai.
bahut hi daad ke saath
SSneh
Devi N

Jan 27 (7 days ago)

satyendra prakash ने कहा…


apni ek garaj se aapki kavita
"chali chavanni thaath se" parhi.
bahut sateek tippni hai.. mai any sikkon ki baat karne vale mitr se sahmat nahin hoon..kyonki 'chavanni' sarvhara / aam admi ka prteek hai..vyangya chhapne ke baad bhejoonga... satyendra prakash