ब्लॉग मित्र मंडली

30/1/11

है क़लम अपना तआरुफ़



आगे बहुत कुछ पोस्ट करने को है , यह ग़ज़ल रह न जाए
इसलिए
मां सरस्वती की कृपा से
दो- तीन घंटे में ही बनी यह ग़ज़ल शस्वरं के सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत है  
***

अभी 22  जनवरी 2011 को भाई वीनस केसरी जी की मेल मिली ,
जिसमें "OBO लाइव तरही मुशायरा" अंक-७ में भाग लेने का आह्वान था ।
छंद और ग़ज़ल का साधक विद्यार्थी होने के नाते मैं तुरंत OBO पर पहुंचा ,
पता चला 23 जनवरी ही अंतिम तिथि है तरही मुशायरे में भाग लेने की ।
बहरे रमल मुसमन महजूफ  पर आधारित इस मुशायरे का मिसरा-ए-तरह था
"देश के कण कण से और(औ) जन जन से मुझको प्यार है" 
घोषित अंतिम तिथि के दिन लिखी और प्रेषित यह ग़ज़ल
 "OBO लाइव तरही मुशायरा अंक-७"में अंतिम दिन 23 जनवरी को प्रकाशित हुई
यहां आपकी परख कसौटी के लिए प्रस्तुत है यह ग़ज़ल

है क़लम अपना तआरुफ़ , कुंद है या धार है !


दोस्त है , माशूक़ है , तो कोई रिश्तेदार है !
जिस तरफ़ भी देखते हैं ; हर तरफ़ बाज़ार है !

है तिज़ारत किस तरह की क्या ये कारोबार है ?
नफ़रतें हैं मंडियों में , …और गायब प्यार है !

आज है गर जीत तो कल हार भी तैयार है !
ज़िंदगी है इक जुआ , इससे किसे इंकार है ?

एक का औज़ार है यह , एक का हथियार है !
है क़लम अपना तआरुफ़ , कुंद है या धार है !

देश की हालत का कहिए कौन ज़िम्मेदार है ?
देश की जनता है या फिर देश की सरकार है !

यूं तो कहने को गुलिस्तां में बहारें आ गईं ,
क्यों कलेजों में गुलों के दहकता अंगार है ?

मुस्कुराते हैं सियासतदां ; …ये बच्चे गा रहे ,
देश के कण कण से औ' जन जन से मुझको प्यार है !

रहबरों को छोड़िए पैग़म्बरों को छोड़िए ,
ख़ाक वो देगा दवा जो ख़ुद पड़ा बीमार है !

हम ज़माने में हुए मशहूर भी बदनाम भी ,
और कुछ होने की कहिए तो किसे दरकार है ?

था जहां कल , आज भी है , कल मिलेगा वो यहीं
दिल में है इंसानियत ; वो साथ ही ख़ुद्दार है !

आज है ज़र्रा , सितारा ख़ुद वो कल बन जाएगा
क़ैद जिसकी मुट्ठियों में वक़्त की रफ़्तार है !

मत यक़ीं राजेन्द्र तू कर , कौन है किसका यहां ?
कौन हमदम ? कौन हमग़म ? कौन यां ग़मख़्वार है ?

- राजेन्द्र स्वर्णकार
(c)copyright by : Rajendra Swarnkar
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अपना ख़याल रखिएगा


77 टिप्‍पणियां:

Pradeep ने कहा…

आदरणीय राजेंद्र जी प्रणाम !

"आज है गर जीत तो कल हार भी तैयार है...
जिन्दगी है एक जुआ इस से किसे इनकार है "

हौसला देती इन पंक्तियों के लिए धन्यवाद....

"था जहाँ कल, आज भी है, कल मिलेगा वो यहीं
दिल में है इंसानियत साथ ही खुद्दार है "

दुनियां की इस भीषण विडम्बना को बहुत सटीक लिखा है आपने..
इस आक्रोश से भरी रचना के लिए धन्यवाद....

मेरे ब्लॉग पर अब दो रचनाएं आपकी प्रतीक्षा में है .....समय मिले तो जरुर पधारियेगा |
आभार !.

sagebob ने कहा…

हमेशा की तरह बेमिसाल .मतला बहुत ही खूब.यह शेर भी आला ...

"रहबरों को छोडीए पैगम्बरों को छोडीए
खाक वो देगा दवा जो खुद पडा बीमार है"

भाई,आप का हर शेर ही ग़ज़ल कहता है.किस किस की तारीफ़ करूं.
आज आप की आवाज सुन पाता तो रविवार की सुबह और भी रंगीन होती.
सलाम .

anupama's sukrity ! ने कहा…

राजेंद्र जी नमस्कार ,
मेरा ब्लॉग अनुसरण करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .
आपने अपनी इस रचना में दिल का दर्द बहुत खूबसूरती सी बयां किया है .
सीधे दिल से निकली हुई पंक्तियाँ हैं -
बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनायें .

शिखा कौशिक ने कहा…

bahut shandar prastuti .shubhkamnaon sahit...

डॉ टी एस दराल ने कहा…

जिंदगी की हकीकतों से रूबरू कराती , एक शानदार ग़ज़ल ।
तरही मुशायरे में शामिल होने के लिए बधाई ।
आपके रंग बिरंगे ब्लॉग को देखकर ही मन प्रसन्न हो जाता है भाई ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज कि परिस्थितियों का सटीक वर्णन करती अच्छी गज़ल

udaya veer singh ने कहा…

priya rajendra ji

namskar ,

dilon men kyon gulon ke dahkata angar hai ------. dil ko sparsh karti
gazal .sundar shilp.
shukrya .

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

samsamayik ghazal kahun ise to is ghaal ke saath dhokha ho jayega... aazaadi ke baad se hee yah haal hai aur ghazal un sare varshon par lagoo hoti hai....

Coral ने कहा…

आदरणीय राजेंद्र जी नमस्कार

बहुत सुन्दर रचना है ... एकदम सरल

--------
बस एक और हो जाये ....

Deepak Saini ने कहा…

मुशायरे मे शरीक होने के लिए बधाई
आज के समाज को प्रस्तुत करती हुई बेहतरीन गजल के लिए शुभकामनाये

Deepak Saini ने कहा…

मुशायरे मे शरीक होने के लिए बधाई
आज के समाज को प्रस्तुत करती हुई बेहतरीन गजल के लिए शुभकामनाये

निर्मला कपिला ने कहा…

दोस्त माशूक तो कोई---- हर एक शेर आज की सच्चाई को बयाँ करता हुया। बधाई ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बड़ी सामयिक रचना।

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर गजल, धन्यवाद

Anupriya ने कहा…

sir, aap to kamaal hain, kitni gahri soch...aur kitni saral abhiwyakti...aapko bahut bahut badhai...aur ham jaise( aapke samakchh nanhe munho) ki hausla afjaai bhi aap karte rahate hai,iske liye shukriya :)

ehsas ने कहा…

आज है जर्रा सितारा कल वो खुद बन जाएगा
कैद जिसकी मुट्ठीयों में वक्त की रफ्तार है।

बिल्कुल सही कहा है आपने।

ehsas ने कहा…

आज है जर्रा सितारा कल वो खुद बन जाएगा
कैद जिसकी मुट्ठीयों में वक्त की रफ्तार है।

बिल्कुल सही कहा है आपने।

यशवन्त माथुर ने कहा…

आदरणीय सर,
बहुत ही सीधी सरल भाषा में गागर में सागर को समेटे है ये ग़ज़ल.बहुत अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर.

सादर

Vijai Mathur ने कहा…

आपने ई.मेल के ज़रिये भी कहा था ,विलम्ब से आपके ब्लाग पर पहुंचा .परन्तु आपके विचार और भाव बहुत अच्छे लगे.धन्यवाद.

सतीश सक्सेना ने कहा…

हर शेर गज़ब का है, आपकी हर रचना सोंचने को मजबूर कर देती है राजेंद्र भाई ! हार्दिक शुभकामनायें !

रचना दीक्षित ने कहा…

हर शेर लाजवाब. ग़ज़ल शानदार.अच्छे भावों से सजी पोस्ट. अच्छी लगी.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

भाई राजेन्द्र स्वर्णकार जी!
गजल तो बहुत हा सशक्त है!
अगर मतला में एक लाइन और होती तो सोने में सुगन्ध भर जाती!

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (31/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

S.M.HABIB ने कहा…

"मत यकीं राजेन्द्र तू कर, कौन है किसका यहाँ?
कौन हमदम? कौन हमगम ? कौन यां गमख्वार है?
वाह... अद्भुत ग़ज़ल... आभार.
पर भैया, आपको सुनने की भी तो आदत पडी हुई है.
इल्तजा है आपकी आवाज़ में सुनने की ....

क्षितिजा .... ने कहा…

आज है जर्रा सितारा खुद वो कल बन जाएगा
कैद जिसकी मुट्ठीयों में वक्त की रफ्तार है।....

वाह वाह !! बहुत खूब राजेंद्र जी ... बेहतरीन ग़ज़ल ... हर शेर लाजवाब ..

boletobindas ने कहा…

वाह मित्रवर ....कई बातों को समेट देते हैं लाइनों में....बाकी रह गई अन्यथा न लेने की बात ..तो बिरादर लेना होगा तो ले लेंगे पूछेंगे थोड़ी न......पर अन्य़था नहीं...कुछ और गज़ल का मजा ..वो भी बिना पूछे....

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुंदर गजल, धन्यवाद|

वाणी गीत ने कहा…

कौन गमखार है , कौन हमदम ....
देश की हालत क्या कहिये कौन जिम्मेदार है , जनता या सरकार ..
क्या कहा जाए !शब्दों की तल्खी विचारों की बेबसी को खूब प्रकट कर रही है ...
शानदार !

nivedita ने कहा…

आपका हर शेर अपने आप में पूर्ण है ,बधाई ।

Anita ने कहा…

आज के हालत को बयां करती हुई बेहद उम्दा गजल!

शारदा अरोरा ने कहा…

bahut hi khoobsoorat gazal .
badhaee sveekaren

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

बहुत सच्चाई बयां की है आपने इन पंक्तियों में.... सुंदर प्रस्तुति.

ज्योति सिंह ने कहा…

रहबरों को छोडीए पैगम्बरों को छोडीए
खाक वो देगा दवा जो खुद पडा बीमार है"
bahut khoob ,har sher laazwaab hai .

इमरान अंसारी ने कहा…

राजेंद्र जी.

बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल......शुभकामनायें|

नीरज गोस्वामी ने कहा…

भाई जी आपकी लेखनी ने एक बार फिर चमत्कृत किया है...एक एक शेर कमाल का है...इतनी जल्दी आपने ग़ज़ल कह डाली ये भी किसी अजूबे से कम नहीं...आप पर माँ सरस्वती की कृपा यूँ ही बनी रहे ये ही कामना करता हूँ...

नीरज

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

"मत यकीं राजेन्द्र तू कर, कौन है किसका यहाँ?
कौन हमदम? कौन हमगम ? कौन यां गमख्वार है?

सीधे सरल शब्दों में इन गजलों के माध्यम से बखूबी देश की सच्चाई बयां करती आपकी ये रचना.

अद्भुत... ब्लाग की खुबसूरती के लिये अलग से बधाईयां आपको...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

बहुत ही सुन्दर ,धारदार ग़ज़ल | राजेन्द्र जी ,

हर शेर जानदार -शानदार !

सूर्य गोयल ने कहा…

श्री मान, आप तो शेरो के शेर निकले. हर शेर एक से बढ़ कर एक. गजब कर दिया राजेन्द्र जी. बहुत-बहुत बधाई.
हम ज़माने में हुए मशहूर भी, बदनाम भी,
और कुछ होने की कहिये तो किसे दरकार है.
बहुत खूब.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

राजेंद्र जी,
क्या कहूँ, हरेक शेर सुन्दर है और समग्र ग़ज़ल बहुत कुछ कहती हुई एक बेहतरीन कृति है ...

रहबरों को छोडीए पैगम्बरों को छोडीए
खाक वो देगा दवा जो खुद पडा बीमार है"
बहुत ही बढ़िया !
धन्यवाद !

गौरव शर्मा "भारतीय" ने कहा…

वाह...
बेहतरीन...
हमेशा की तरह लाजवाब पोस्ट पढ़कर मन इस बार भी प्रसन्न हो गया |
कामना है की आप इसी प्रकार अपने कलम का जादू दिखाते रहें और हम आपको पढ़कर मुस्कुराते रहें |

वीना ने कहा…

आपके ब्लॉग पर बहुत अच्छा लगता है...स्वरो के छिड़ते ही आनंद दोगुना हो जाता है

जिस तरफ भी देखते है हर तरफ बाजार है
क्या बात कही है...
हर शेर खूबसूरत

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

आज है ज़र्रा ,सितारा खुद वो कल बन जायेगा
कैद जिसकी मुट्ठियों में वक़्त की रफ़्तार है ....

सुभानाल्लाह .....

आपके शे'र ज़िन्दगी को राह दिखाते हैं ....
और दिए गए मिसरे को तो बखूबी प्रयोग किया है आपने ...

मुस्कुराते हैं सियासतदां;...ये बच्चे गा रहे
देश के कण-कण से ...... .....

बहुत खूब .....!!

Swarajya karun ने कहा…

गज़ल शानदार है.

Swarajya karun ने कहा…

गज़ल शानदार है.

कुश्वंश ने कहा…

"था जहाँ कल, आज भी है, कल मिलेगा वो यहीं
दिल में है इंसानियत, साथ ही खुद्दार है "
बहुत सटीक लिखा है राजेन्द्र जी आपने.. लाजवाब,शानदार रचना के लिए धन्यवाद....

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

राजेन्द्रजी,
कुछ ही पलों में तैयार की गई है यह गज़ल..जाहिर होता है।

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

# प्रदीप जी, शुक्रिया ! आता हूं आपके यहां भी … :) मेल के लिए भी यहीं धन्यवाद दे देता हूं ।

# Respectable sagebob , आभारी हूं !
हर रचना गा'कर लगाना संभव भी नहीं …और उचित भी नहीं शायद ।
मेरी पुरानी पोस्ट्स को भी समय मिले तो खंगाल लिया करें ।

# अनुपमा जी, धन्यवाद आपको भी !

# शिखा जी, आभार !

# डॉ.दराल साहब, मेरी कलाप्रियता आपको पसंद आ रही है ,
जान कर सचमुच अच्छा लगा ।

# संगीता जी, शुक्रिया ! आपके यहां इन दिनों कम पहुंचा हूं, कल तक आता हूं । … क्षमा-सनेह भाव बनए रखें ।

# उदयवीर सिंह जी, स्वागत और आभार !
आपके ब्लॉग का अवलोकन किया है, अच्छा है ।
एकाध दिन में पुनः आ रहा हूं ।

# स्वप्निल जी,सही कहा आपने ।
साथ ही अन्य तरह के शे'र भी तो हैं … जैसा कि ग़ज़लों में होता है ।
शुक्रिया और आभार !

# तृप्ति जी, आभार !
नई पहचान अच्छी लग रही है … इन्द्रनील जी को भी बधाई दे आया हूं ।

# दीपक सैनी जी, बहुत धन्यवाद !

# निर्मला कपिला जी, प्रणाम ! आपका आशीर्वाद मेरा ख़ज़ाना है ।

# प्रवीण जी, सहृदयता-स्नेह के लिए आभार !

# राज भाटिया जी, नमन … आभार !

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

# अनुप्रिया जी, :) आपकी बात दो बार पढ़ने पर समझा …
ये तो है मेरी विद्वता का प्रमाण ;)
सभी एक दूसरे से कुछ न कुछ अवश्य सीखते हैं । आभार … आया कीजिए, कृपया !

# अमित जी, ehsas … शुक्रिया !

# यशवंत जी, स्वागत और आभार ! आगे भी आपका इंतज़ार रहेगा…

# विजय जी, स्वागत एवं धन्यवाद ! शुक्र है आए तो …
आपका घर है … आते रहिएगा

# सतीश जी, आभार ! सदैव स्नेहाभिलाषा रहेगी आपसे …

# रचना जी, बहुत बहुत कृतज्ञ हूं …

# रूपचन्द्र शास्त्री जी, मतले में एक लाइन और … ? :) … मतलब ?
आपका आशय एक और हुस्ने-मतला से है शायद ।
यूं लिखने की सीमाएं तो है नहीं …
मेरे एक परिचित शायर जनाब निसार अहमद अनजान साहब जिन्होंने लगभग पांच हज़ार ग़ज़लें लिख रखी हैं ,
उनकी कुछ ग़ज़लों में 150 से 500 शे'र हैं ।
जिनमें अनेक ग़ज़लों के 20-20 25-25 मतले के शे'र हैं
हरि अनंत हरि कथा अनंता …

# वंदना जी, चर्चा मंच पर आप मुझे बराबर स्थान देती हैं … कृतज्ञ हूं ।
स्नेह आशीर्वाद बनाए रहें …

# 'सद्भावी मानव' हबीब साहब {S M का यही फुल फॉर्म लगता है मुझे :)} शुक्रिया !
फिर हाज़िर हो जाऊंगा तरन्नुम के साथ आगामी किसी प्रविष्टि में …

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

# क्षितिजा जी, आपका कथन कमेंट बॉक्स में बहारों का मौसम ला देता है :)
पिछली पोस्ट में आपने जब यह लिखा कि -
"यदि मेरे बस में होता तो ये गीत मैं इस देश के कोने कोने में बजवा देती…"
… तो यह पढ़ने के बाद आपको मेरे मन की उस समय की बात कह रहा था मैं
… लेकिन दुर्भाग्य कि अन्य 70-75 कमेंट्स का जवाब नोटपेड पर लिखते हुए
किसी कारण नोटपेड डिलीट हो गया और सारी मेहनत बेकार जाने से मन ख़राब हो गया ।
और आपकी मेल आईडी मेरे पास न होने से आपको जवाब नहीं दे पाया … ख़ैर !
आते रहिएगा …

# रोहित जी, आपके प्यारे निराले अंदाज़ का कायल हूं …
मैं ख़ुद आपकी पोस्ट पढ़ने के बाद भी चाहे कमेंट न करूं,
लेकिन अपनी पोस्ट पर आपकी राह देखता रहता हूं ;)
… लेकिन , मेरी इस मामले में बराबरी मत करना दोस्त !
बहुत इंतज़ार रहता है आपका हर पोस्ट पर …

# Patali-The-Village, आभार ! शुक्रिया ! फिर आइएगा …

# वाणी जी, सही पहचाना आपने । आभार ! प्रतीक्षा रहेगी आगे भी …

# निवेदिता जी, ता'रीफ़ के लिए शुक्रिया !

# अनिता जी, स्नेहाशीष बनाए रहें …

# शारदा जी, नमन ! अशीर्वाद देते रहें ।

# उपेन्द्र जी, सराहना के लिए आभार !

# ज्योति सिंह जी, ग़ज़ल आपको पसंद आई, मैं धन्य हुआ …
शुक्रिया !

# इमरान जी, बहुत बहुत आभारी हूं …

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

# अमिताभ जी, नमस्कार !
" कुछ ही पलों में तैयार की गई है यह गज़ल… जाहिर होता है। "
जाहिर होता है से क्या समझूं ? आपको कोई कमी लगी ?!
कृपया , शिल्प कथ्य भाव की किसी त्रुटि की ओर आपका इशारा है तो स्पष्ट बताएं ।

मैं स्वयं की गलती सुधारने का ,
तथा और श्रेष्ठ करने का अवसर पा'कर आपका और भी आभार मानूंगा ।

# कुश्वंश जी, सादर स्वागत समर्थन और प्रथम पदार्पण के लिए!
आभारी हूं… आपको रचना पसंद आई । आगे भी आपकी प्रतीक्षा रहेगी ।
आपका ब्लॉग लिंक नहीं मिला …

# स्वराज्य करुण जी, आप पहली बार आशीर्वाद देने पधारे हैं … आभार !
आज ही पिछली पोस्ट पर भी आपकी प्रतिक्रिया पा'कर धन्य हुआ ।
आगे भी अवश्य आइएगा …

# हीर जी, मेहरबानी !
"मल्लिका-ए-नज़्म" की नज़रे-इनायत पा'कर मेरी ग़ज़ल धन्य हुई :)
शुक्रिया !

# वीना जी, ग़ज़ल पसंद करने का शुक्रिया !
आप जैसे क़द्रदानों की हौसलाअफ़्ज़ाई के कारण रचनाएं गा'कर लगाने को मन करता है ।

# गौरव जी "भारतीय", आभारी हूं ! स्नेह बनाए रहें …
आपके दोनों ब्लॉग पढ़ता रहता हूं , लेकिन कमेंट बॉक्स में मेरी अनुपस्थिति चल रही है , क्षमा करें ।

# इन्द्रनील जी, आभार !
आप-से कलाकार दम्पति युगल के लिए हृदय से शुभकामनाएं हैं !

# सूर्य गोयल जी, 'शेरो के शेर' ख़िताब से नवाज़ने के लिए कोटिशः आभार !
आपके स्नेह-समर्थन से मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है । गुफ़्तगू पर आता रहता हूं

# सुरेन्द्र सिंह जी, प्रोत्साहन मिलता है आप जैसे पारखी द्वारा तो स्वयं को धन्य मानता हूं ।
आभारी हूं ! कृपया, आते रहें …

# सुशील जी बाकलीवाल साहब,उत्साहवर्द्धन के लिए आभार !
ब्लॉग की ख़ूबसूरती आपको पसंद आई … बच्चों की मेहनत सफल हुई … आगे भी आएं

# नीरज जी, मां सरस्वती के आशीर्वाद के साथ
आपका स्नेह - अपनत्व भी मेरे लिए महत्वपूर्ण आवश्यकता है ।
आप जैसे ग़ज़ल पर नियमित काम करने वालों की परख-कसौटी से गुज़रने पर और अच्छा करने की प्रेरणा मिलती है … निस्संदेह !
स्नेहाशीर्वाद बनाए रहें …

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

bahut sundar post bhai rajendraji badhai.comments ke liye dhanyvad mai u p ka hun uttarakhand ab alag rajya hai kintu mujhe desh ke har kone ki mati se utana hi lagav hai

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

bahut sundar post bhai rajendraji badhai.comments ke liye dhanyvad mai u p ka hun uttarakhand ab alag rajya hai kintu mujhe desh ke har kone ki mati se utana hi lagav hai

तिलक राज कपूर ने कहा…

प्रश्‍न मत पूछा करें, उत्‍तर नहीं दे पाएगा
सच कहे तो कौन सुनने के लिये तैयार है।
ये बह्र, रदीफ़ और काफि़या झूमने को मजबूर करते हैं।

संजय ग्रोवर Sanjay Grover ने कहा…

हम ज़माने में हुए मशहूर भी, बदनाम भी,
और कुछ होने की कहिए तो किसे दरकार है ?

था जहां कल, आज भी है, कल मिलेगा वो यहीं
दिल में है इंसानियत; वो साथ ही खुद्दार है

ये दो शेर ख़ास तौर पर अच्छे लगे, आपके ब्लॉग पर कॉपी नहीं हो सके तो ख़ुद टाइप करके लगा रहा हूं :)

KK Yadava ने कहा…

बहुत सुन्दर गजल..बधाई !!

रंजना ने कहा…

एक से एक लाजवाब शेर...

शानदार ग़ज़ल...

पढ़ के मन खुश हो गया....वाह !!!

daanish ने कहा…

है तिजारत किस तरह की, क्या ये कारोबार है
नफरतें हैं मंडियों में, और ग़ायब प्यार है
आज है ज़र्रा, सितारा खुद वो कल बन जाएगा
क़ैद जिसकी मुट्ठियों में वक्त की रफ़्तार है

ग़ज़ल के तमाम अश`आर पढ़ते ही
मन से बस इक लफ्ज़ निकलता है ...
वाह !!
हर शेर में ,
समय और समाज के तेवर खुद झाँक रहे हैं
हर शेर खुद अपने आप को पढवा रहा है
मुबारकबाद कुबूल फ़रमाएँ !

अनवारुल हसन [AIR - FM RAINBOW 100.7 Lko] ने कहा…

आदरणीय राजेंद्र जी नमस्कार!
मेरे घर (ब्लॉग) पर पधारने के लिए धन्यवाद आप की रचना धर्मिता का क़ायल हो गया ... बधाई स्वीकार कीजिये.

Pran Sharma ने कहा…

Aapkee lekhni kaa kaayal hoon main,
sabhee ashaar mun ko sparsh karte
hain . badhaaee aur shubh kamna .

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

बहुत प्रभावशाली गज़ल है राजेन्द्र जी ,पढ़ कर विभोर हो गई .कहीं नहीं लगा कि कोशिश करके लिखी है ..अंतर के उद्गार एक संकेत पाते ही मुक्त हो कर बह निकले हैं .
बहुत बहुत ,बधाई !

'साहिल' ने कहा…

राजेन्द्र जी, एक बार फिर से बहुत ही प्रभावशाली ग़ज़ल कही है आपने.....बधाई.
सारे शेर खूबसूरत हैं..........कोई एक quote करना मुश्किल है .

Kunwar Kusumesh ने कहा…

आपकी क़लम का वाक़ई जवाब नहीं है ,भाई राजेंद्र जी.
बड़ी सादगी और सलासत है आपके अशआर में.

रहबरों को छोडीए पैगम्बरों को छोडीए
खाक वो देगा दवा जो खुद पडा बीमार है"

अहा, क्या बात है.सीधे दिल पर असर करता है ये शेर.

पूरी ग़ज़ल लाजवाब है, लाजवाब.

"पलाश" ने कहा…

हर शेर लाजवाब. ग़ज़ल शानदार

please see this also


सभी ब्लागर्स से सजग रहने की अपील

musaffir ने कहा…

rajendra ji sachmuch jindgi me doobi rachna. aabhar

chandrabhan bhardwaj ने कहा…

Bhai Rajendra ji
Samsaamyik paristhitiyon par bahut hi achchhi ghazal kahi hai apne.
har sher apne aap men poorn aur sunder
meri hardik badhai.
Shubh kamnaaon sahit,
chandrabhan Bhardwaj

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

राजेंद्र जी!
"ग़ज़ल आप की, वाक़ई टाप की है।
सही तौल की है, सही नाप की है॥"
सराहनीय लेखन....हेतु बधाइयाँ...ऽ.
सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

saanjh ने कहा…

sajda qubool karein sir....kya khooob ghazal kahi hai.....its unmatched....bohot bohot bohot khoobsurat!!!1

POOJA... ने कहा…

बहुत अच्छी ग़ज़ल है... कितने सुन्दरता से शब्दों का जाल बुन दिया आपने...
वाह...
मुझे भी सीखना है...

sushant jain ने कहा…

था जहां कल , आज भी है , कल मिलेगा वो यहीं
दिल में है इंसानियत ; वो साथ ही ख़ुद्दार है !

Aap dara rahe he fir bhi nahi badalunga :D

Aapki gazal par comment karu me apne aapko is kabil nahi samjata...


Sushant Jain

amrendra "amar" ने कहा…

behtreen abhivyakti k liye badhai sweekar karein

mahendra verma ने कहा…

आपकी यह ग़ज़ल पाठकों के हृदय के साथ तादात्म्य स्थापित करने में सफल हुई है।
इस श्रेष्ठ रचना के लिए बधाई भाई, स्वर्णकार जी।

munnibadnaam ने कहा…

bahut badhiya gazal



hamaare yahan bhi aao darling

' मिसिर' ने कहा…

बेहतरीन,बेहतरीन,बेहतरीन ..........
एक-एक शेर रोमांचकारी !
कमाल का कलाम !
बहुत बधाई !

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

एक से बढकर एक, बहुत ही सशक्त गजल, शुभकामनाएं.

रामराम.

vidrohiavyav ने कहा…

Rajendra ji

Apke blog ko padhkar kafi achha laga.
APki rachnaon me naveenta ke saath saath vrihat vistaar bhi dekhne ko mila.

Bahut hi sundar rachnayein aur bahut sundar blog.

-Mayank

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

राजेंद्र जी , जिंदगी की कड़वी सच्चाई बयां की आप ने इन पंक्तियों में. बहुत ही सुंदर ..................
सैनिक शिक्षा सबके लिये

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" ने कहा…

greattttttttt