ब्लॉग मित्र मंडली

20/2/11

प्यारो न्यारो ये बसंत है !

मां सरस्वती का यह चित्र मैंने 16-17 वर्ष की उम्र में बनाया था 

 आज प्रस्तुत है बासंती कवित्त

 
    पवन सुहावनी है , रुत भानी है    
मेरे घर , मेरे उर में सखी बसंत है !
  विमुख वियोग मो' से , समुख सुयोग मेरे   
 पल प्रतिपल पास प्राणप्रिय कंत है !
 दांव - दांव जीत मेरी सांस - सांस गीत गावै  
 मेरे सुख आनंद को आदि है न अंत है !
   जग में हज़ार राह , मोहे न किसी की चाह   
मोहे प्राण से पियारो प्रणय को पंथ है !
 अमुवा पै बौर , गावै पिक , नाचै मोर 
 मेरे चित चितचोर ...  मतवारो ये बसंत है !
बाग़ में , तड़ाग मांही , आग मांही , राग मांही ,
 भाग में , सुहाग मांही प्यारो ये बसंत है !
सखी वारि जाऊं , निज भाग्य को सराहूं ,
 झूम झूम गीत गाऊं... प्यारो न्यारो ये बसंत है !
  बैर ठौर प्रीत , प्रीत वारों की या रीत   
हार में ही छुपी जीत को इशारो ये बसंत है !
खेत खेत  पीली पीली  सरसों की चादर है 
वन - वन खिल्यो लाल - केशरी पलाश है !
केतकी गुलाब जूही मोगरा चमेली गेंदा
भांत - भांत फूलन की गंध है , सुवास है !
भ्रमर करे गुंजार , तिलियां डार - डार 
चहुं दिश मदन की मस्ती को आभास है !
बिसरी है सबै सुध , भ्रमित भयी है बुध 
मन्मथ - रति  को कण - कण महारास है !
 
सृष्टि वा की वा है... ऋतुराज के पधारने से 
सगरे जगत में नवीन कोई बात है !
  दिवस नूतन , निशा नवल नवेली  
नव पुष्प , नव गंध , नव पात , नव गात है !
दृष्टि वारे देखे... नव सृष्टि के निमित 
 कर वीणा लिये' गा'य रही शारदा साक्षात है !
देव महादेव जब झूमने लगे 
बिचारे मनुज राजेंदर की  कहो क्या बिसात है !?
- राजेन्द्र स्वर्णकार
(c)copyright by : Rajendra Swarnkar


बसंत – बहार का एहसास कराते मेरे ये कवित्त

मेरी कंपोजीशन में मेरे स्वर में

(c)copyright by : Rajendra Swarnkar


मेरे कार्य को देख-परख कर आप अपनी जो प्रतिक्रिया देते हैं
वही मेरी दौलत है
बसंत ॠतु
की
हार्दिक शुभकामनाएं


123 टिप्‍पणियां:

Rahul Singh ने कहा…

बड़े सुंदर बसंत के रंग.

Vijai Mathur ने कहा…

बड़ी अच्छी रचना है.हार में छिपी जीत वाली बात मन-भावन है.

निर्मला कपिला ने कहा…

माँ शारदे की सुन्दर तस्वीर और पोस्ट मे बिखरे बसंत जैसे रंग बहुत अच्छे लगी। बधाई और शुभकामनायें।

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत सुन्दर तस्वीर और ये वसंत की बेहतरीन छटा

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

अत्यंत सुंदर भाव विभोर कर गये ये बासंती क्षण, शुभकामनाएं.

रामराम.

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (21-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

Bhushan ने कहा…

कवित्तों की सुंदर कोंपलें खिलीं हैं. सुदर अति सुंदर.

mahendra verma ने कहा…

वसंत के मनभावन रंग कवित्त में स्पष्ट परिलक्षित हो रहे हैं।
ऐसा लग रहा है कि ये रंग बोल रहे हैं।
अनूठी प्रस्तुति।
बधाई एवं शुभकामनाएं।

Deepak Saini ने कहा…

आपकी आवाज आपकी कविता को चार चाँद लगा देते है
बासंती कविता की रंगीनीयत भी सुन्दर है, कविता के तो खैर कहने ही क्या

Deepak Saini ने कहा…

आपकी आवाज आपकी कविता को चार चाँद लगा देते है
बासंती कविता की रंगीनीयत भी सुन्दर है, कविता के तो खैर कहने ही क्या

ज्योति सिंह ने कहा…

is rachna ko padhte samya mahaul poora basanti ban pada ,uttam .

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वाह , बहुत सुन्दर कवित्त ...बहुत समय बाद ऐसी सुन्दर रचना पढने को मिली

Anita ने कहा…

वसंत का इतना सुंदर स्वागत आपने अपनी इस पोस्ट में किया है की तारीफ के लिये शब्द कम पड़ते है, बहुत बहुत बधाई!

: केवल राम : ने कहा…

रचना को पढना और सुनना आनंद दायक है ...बसंत के विविध रंग ....

Kailash C Sharma ने कहा…

आपके कवित्तों के भावों और उनके मनभावन सम्प्रेषण ने निशब्द कर दिया..केवल आभार के सिवाय और क्या कहा जा सकता है इतनी सुन्दर प्रस्तुति के लिए.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

वसंत का अदभुद रंग दिखा गए आप.. सुन्दर स्वर संयोजन भी...

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

क्या खूबसूरत रंगों से सजाई है कविता, बहुत सुन्दर स्वर्णकार जी.

Arvind Mishra ने कहा…

वाह ,मन फागुन तन बासंती हो गया यह बसंत राग देख सुन ....

sagebob ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचनाएँ.आपकी आवाज़ सुबह सुबह सुन कर गया था.
सारा दिन मेरे कानों में गूंजती रही.
"हार में ही छुपी जीत को इशारों ये बसंत है".

राजेन्द्र जी,आप ही हमारी इस ब्लॉग दुनिया के बसंत देव हैं.
आपकी कलम को नमन.

S.M.HABIB ने कहा…

अद्भुत लेखन, परा-अद्भुत गायन..
आभार....
सादर...

राज भाटिय़ा ने कहा…

चित्र जो आप ने बचपन मे बनाया बहुत सुंदर लगा, आप की बसंती रंगो मे रंगी रचना सुनाने ओर पढने मे भी बहुत खुब सुरत लगी धन्यवाद

आशा ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना और गायन |मन विभोर हो गया |बहुत बहुत बधाई |
आशा

मनोज कुमार ने कहा…

मन बासंती हो गया।
• इस ऊबड़-खाबड़ गद्य कविता समय में आपने अपनी भाषा का माधुर्य और गीतात्मकता को बचाए रखा है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सरसों सी पीली-पीली चदरिया को ओढ़कर,
मन की नगरिया में आया बसन्त है।
रंगों के इन्द्रधनुष चहकने लगे हैं आज,
महकने लगी सुवास दिग और दिगन्त है।
बागों में बोल रहीं कोयलियाँ कुहू-कुहू,
वासन्ती सुमनों की महिमा अनन्त है।
--
सुन्दर कवित्त और मनबावन गायन से,
लेखनी में आपकी छाया बसन्त है ......

daanish ने कहा…

वसंत ऋतु के शुभ आगमन में
स्वागत स्वरुप प्रस्तुत काव्य
हर दृष्टि से प्रभावशाली,रोचक और मननीय है ...
प्राकृतिक स्वाभाविक स्थिति का
अवलोकन और विवेचन,
शब्द - शब्द से प्रतिविम्बित हो रहा है...
मानो ऋतुराज स्वयं विद्यमान हो गए हों .....
सृजनात्मकता के यही गुण
आपकी काव्य कुशलता और रचनाशीलता को
रेखांकित कर पाने में हमेशा
समर्थ और सफल रहते हैं

एक आलौकिक और दिव्य कृति पर बधाई स्वीकारें.

anupama's sukrity ! ने कहा…

राजेंद्र जी -सौंदर्य की पराकाष्ठा है आपकी कृति -
रूप में,रंग में ,सुर में ,उर में ,शब्दों में ,बोलों में ,राग में ,अनुराग में ,बसंत ही बसंत है -
बहुत सुंदर रचना बधाई.

सतीश सक्सेना ने कहा…

वसंतोत्सव का स्वागत करने के लिए आपसे बेहतर और कौन है ! आभार आपका राजेंद्र भाई

नीरज गोस्वामी ने कहा…

दांव-दांव जीत मेरी ,सांस सांस गीत गावै
मेरे सुख आनंद को आदि है न अंत है
****
बैर ठोर प्रीत, प्रीत वारों की या रीत
हार में ही छुपी जीत को इशारों ये बसंत है
****
भ्रमर करे गुंजार, तितलियाँ डार डार
चहुँ दिश मदन की मस्ती को आभास है
****
दिवस नूतन निशा नवेली
नव पुष्प, नव गंध, नव पात नव गात है
****
राजेंद्र जी आपकी रचनाओं की प्रशा के लिए उपयुक्त शब्दों के लिए हमेशा भटकना पड़ता है और हर बार खाली हाथ ही लौटना पड़ता है...मन के उस आनंद को. जो आपकी रचनाओं से मिलता है,शब्दों में बतलाना असंभव है...आपकी रचनाएँ पढता हूँ, आँखें बंद करता हूँ और परमानन्द प्राप्त कर लेता हूँ...आप को आपकी लेखनी को प्रणाम...माँ सरस्वती अपना स्नेह आप पर यूँ ही लुटाती रहे ये ही कामना करता हूँ...
नीरज

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

आपकी सुन्दर वासंती रचना . पढ़ कर
मुग्ध हो गई .लगा रीति काल के पद्माकर आदि कवियों का काव्य पढ़ रही हूँ
.वैसा ही सरस मधुर और मनोरम .यह परंपरा तो अब तक रुकी पड़ी थी - आपने इसे
पूरे भाव और कला सहित पूरे वेग से प्रवाहित कर दिया -

'दाँव दाँव जीत मेरी........न अंत है ' (हृदय का उल्लास शब्दों में
व्यक्त हो गया है )
प्रकृति का परिवेश मादकता और वसंत का व्यापक प्रभाव !सचमच सभी बौरा जाते हैं -बिचारे
राजेन्दर की कौन बिसात !
रचना तो है ही ,जिन वासंती रंग और रूपों में उसे सँजोया है, संगीत के स्वरों ने ,उसकी तो बात ही क्या ! बहुत -बहुत सुन्दर !

ZEAL ने कहा…

माँ सरस्वती का चित्र बहुत ही मन भावन लगा । बसंत का स्वागत करती इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई ।

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

बहुत सुंदर/सारगर्भित रचना बधाई.

सदा ने कहा…

भ्रमर करे गुंजार, तितलियाँ डार डार
चहुँ दिश मदन की मस्ती को आभास है

प्रत्‍येक शब्‍द बसंत का आभास कराता हुआ ..आभार इस अनुपम प्रस्‍तुति के लिये ।

ZEAL ने कहा…

माँ सरस्वती का चित्र बहुत ही मन भावन लगा । बसंत का स्वागत करती इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई ।

डॉ. दलसिंगार यादव ने कहा…

स्वर्णकार जी, आपने इस रचना के माध्यम से वसंत का जो मदमस्त चित्रण प्रस्तुत किया है वह तो प्रशंसनीय है ही, इसे स्वरबद्ध करके इसे और मदमस्त बना दिया है। बधाई और शुभकामना।

कौशलेन्द्र ने कहा…

भाई ! राजेन्द्र जी ! आपके लिखे -गाये कवित्त पढ़े ....सुने .....गुने .......गुनगुनाये भी ......पर आपके आलाप ने ही आगरा फोर्ट के दरबारेख़ास में पहुँचा दिया ....इससे पहले मैं सरसों के खेत देखकर दौसा के खेतों में था ...खैर आगरा वहां से अधिक दूर नहीं है .......लेकिन बहुत तीव्र गति से पहुंचाया आपके आलाप ने, गनीमत है कोई रोड एक्सीडेंट नहीं हुआ ......यहाँ हमारे हॉस्पिटल में प्रतिदिन के औसत से ६-७ ऐसे गंभीर केस आ जाते हैं ...इसलिए थोड़ा डर लगा रहता है . एक अच्छी बात यह रही कि .....साथ में सितार या वीणा नहीं थी ...अन्यथा मैं तो अकबर के दरबार से लौट ही नहीं पाता......अभी शाम को हॉस्पिटल भी जाना है ....आपको धन्यवाद कि मुझे मुग़ल दरबार में नहीं ले गए.
रीतिकालीन शिल्प में राजस्थान की पच्चीकारी ने मन को मोर बनाके उड़ा दिया ...अब उसे पकडकर लाना पडेगा. यह एक काम और बढ़ा दिया आपने मेरे लिए.
कुछ कारणों से मैं दो पंक्तियों पर बार-बार ठिठक जा रहा था -"हार में ही छुपी जीत को इशारो यो वसंत है." और ...."दृष्टि वारे देखे ....नव सृष्टि के निमित्त" .........ये गूढ पंक्तियाँ कई अर्थों को समेटे हैं अपने अन्दर. यह रहस्य भी है और समाधान भी. पर कोई मानने को तैयार हो तब न !

रंजना ने कहा…

वाह....अद्वितीय !!!

रस रंग बिखेर दिया आपने शब्दों में भर भर के...

बहुत ही सुन्दर रचनाएं...

Kunwar Kusumesh ने कहा…

चारो कवित्त एक से बढ़कर एक बसंत की मनमोहक छटा बिखेरते हुए. तस्वीरें उनके अनुरूप कवित्त में चार चाँद लगाती हुई.
ब्लॉग का रंगबिरंगापन भी बसंत के अनुसार.वाह

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

सतरंगी रंगों में रंगी आपकी रचना वसंत बहार के सौंदर्य को बखूबी दिखा रही है...अतिसुंदर।

*गद्य-सर्जना*:-“तुम्हारे वो गीत याद है मुझे”

ghazalganga ने कहा…

भाई राजेंद्र जी!
बसंत के स्वागत में रचे आपके गीतों में इतनी कशिश, इतनी रवानी है कि पतझड़ के मौसम में भी इन्हें गुनगुनाने पर बसंत का आभास होने लगे. निश्चित रूप से यह गीत हर साल बसंत के मौसम में खुद-ब- खुद लोगों कि जुबान पर आ जायेंगे और ये गीत लम्बे समय गुनगुनाये जायेंगे. कालजयी रचना के लिए बधाई स्वीकार करें.

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

आदरणीय राजेन्द्र जी ,
सप्रेम अभिवादन
क्या कहूं , बस छंदों को पढ़कर और सुनकर असीम आनंद मिला |
बीच-बीच में चित्रों के कुशल संयोजन ने तो चार चाँद ही लगा दिए |
बस , लेखनी अबाध चलती रहे !

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

आद. राजेंद्र जी,
आपके कवित्त पढ़कर और सुनकर तन ,मन सब कुछ वसंत वसंत हो गया ! मै अपनी अभिव्यक्ति बस इन दो पंक्तियों में व्यक्त करना चाहूँगा !
कोयल साँसों में बसे,हृदय बसे उल्लास ,
मन को वासंती करे, शब्द-शब्द मधुमास !
हर मौसम आपके लिए वसंत हो, इन्ही शुभकामनाओं के साथ,
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

ali ने कहा…

प्रिय भाई राजेन्द्र जी,
(१)
कई बार सोचता हूं कि बसंत का सत्य आखिर बसता कहां है ? अपने बाहर की प्रकृति में याकि अपने अंतर्मन में...पवन , ऋतु , वियोग , नैकट्य , जीवन , आनंद ,चाह और प्रणय भी इस कसौटी से इतर नहीं हैं ! फिर ख्याल ये भी आता है कि बसंत अगर बाह्य है , ऋतु है तो प्रकृति के हिस्से थोड़ा सा है लेकिन बसंत अगर प्रणय है ,अंतर्मन में है तो वह ऋतु और काल के बंधन से मुक्त है ,असीम अनंत आकाश जैसा उर बसा बसंत !

(२)
घनघोर श्रृंगार पगे शब्द भले ही मोर ,बौर , राग , आग आदि आदि को उच्चारते लगें पर सारे के सारे अंततोगत्वा , प्रतीकात्मक तौर ही सही ,सुहाग , प्रीत और उसके समर्पण में जय का उदघोष करते हैं ! एक तिलस्म जो कभी ना टूटे की आकांक्षा के साथ जीने का जी करता है !

(३)
रंग ,पुष्प ,सुगंध ,भ्रमर गुंजन , और तितलियों की यायावरी सच कहूं तो मदन गंध में समाहित सी हो चली हैं ! महारास के इतने आयाम कभी देखे ना सुने ! प्रियालीन को सुध बुध कैसी ?

(४)
सृष्टि और ईश्वरत्व को प्रणय से जोड़ता ! चहुँ ओर नव्यता का आह्वान करता मनुष्य ! गज़ब का समापन है बसंत आबद्ध तीनों कवित्तों का !

प्रतिक्रिया स्वरुप इतना कुछ लिख कर भी एक कसक सी है गोया अब भी कोई कथ्य शेष रह गया हो !

पता नहीं क्यों मुझे यह ऋतु गान एक अदभुत दर्शन जैसा प्रतीत हुआ !

girish pankaj ने कहा…

अद्भुत संरचना है ये. जैसी रचना, वैसा आलापी स्वर. उससे भी कहीं ज्यादा. मै दावे के साथ कह सकता हूँ, की इस वक्त अपने देश मे इक्का-दुक्का लोग ही होंगे जो इतना सुन्दर लिखे और उससे बेहतर गायन करे. कहाँ से उतरी है यह प्रतिभा? मेरी शुभकामना है की आप इसी तरह सक्रिय रहे. मैं तो केवल ले-दे कर अदा-तिरछा लिखता भर हूँ, मगर आप...बाप रे बाप...अद्भुत गायिकी भी मंच पर आप आये तो कोई दूसरा टिक नहीं सकता, आपसे प्रेरणा ले रहा हूँ, की मैं भी इतना सुन्दर लिख और गा सकता लेकिन हर कोई राजेंद्र स्वर्णकार सा आकार नहीं ले सकता..ऐसा मुझे लगता है. मेरी शुभकामनाये... वसंत की...

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι ने कहा…

बेहतरीन रचनायें मुबारकबाद राजेन्द्र भाई।

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

सगरे जगत में नवीन कोई बात है ......

प्रकृति की इस सुंदर वर्णना और आपकी मीठी मुग्ध आवाज़ ने मन को बहुत शान्ति दी ...
अब शांत मन से सो पाऊँगी शायद .....
ऊपर माँ सरस्वती की सुंदर आकृति .....कितनी प्रतिभा है आपमें ...
कवि,कलाकार,चित्रकार,स्वर्णकार कौन सा हुनर नहीं है आपमें .....
क्या कहूँ ...आप तो गुरुजन्य हैं ....!!

वाणी गीत ने कहा…

हार में छिपी जीत को इशारो ये वसंत है ..
मौसम ने तो वसंत पर लगाम कस रखी है , मगर इस कविता में साक्षात् उतर आया है !

प्रतुल ने कहा…

.

आदरणीय राजेन्द्र जी,
आपने कवित्त को गाने की नयी विधा के दर्शन करा दिए. आपने बसंत पर जिन कवित्त का पाठ किया है उनकी स्वर-लहरियों से लगने लगता है कि
बंद कमरे में भी बयार बह रही हो. कवित्त अब तक ओज गुण का उत्पादन किया करते थे लेकिन आपने अपनी स्वर-तरंगों से उसे नवीन गुण 'माधुर्य' से परिचित करवा दिया है.
सभी कवित्त उत्कृष्ट कोटि के हैं. कवित्त की गीति को इन विलम्बित स्वर-लहरियों में ढलने की मैंने कल्पना भी न की थी. आप मोडिफाई करने के महारथी भी सिद्ध हुए. वैसे कवित्तों को कई पद्धतियों से गाते सुना हैं मैंने लेकिन वासंतिक बयार पद्धति से नहीं सुना था. बेहद ऋणी हूँ.
इन स्वर-लहरियों का. जिसने मुझे नवीनता के दर्शन कराये.
वैसे मेरे पिता बेहद रोचक और सस्वर पाठ करते हैं कवित्त और सवैयों का.
मैं तो सीख ही रहा हूँ.

.

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

वासंती कविता..+ वासंती रंगों में रंगे शब्द..
+ वासंती प्रस्तुति...+ वासंती स्वर...
= सोने में सुहागा...
राजेन्द्र जी, आपतो बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं!
हार्दिक शुभकामनाएं !

saanjh ने कहा…

behad behad khoobsurat....bohot pyaara geet hai....aur aapne bohot khoobsurat gaaya hai....aur vo maa saraswati ki tasveer.....ur a truly gifted man sir....pleasure reading u

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

सबसे पहले आपके बनाए अद्भुत बाल-चित्र की बधाई ! बसंत के रंगों से सांगोपांग नहाई हुई रचना का आभार,पुनः मधुर गायन के लिए !

Satish Chandra Satyarthi ने कहा…

गज़ब!!! शब्दों के मोहक संयोजन से बड़ा ही बसन्ती वातावरण रचा है आपने...जितनी तारीफ़ करूँ कम है... कविता को बड़ा सुन्दर लयबद्ध किया है आपने स्वर में.. बधाई...
[आपके ब्लॉग के पृष्ठ में जो चित्र है उसकी वजह से ब्लॉग लोड होने में काफी समय लेता है.. मेरा इंटरनेट भारत के ब्रॉडबैंड से कम से कम ५ गुना तेज तो है ही फिर भी काफी समय लिया खुलने में तो वहाँ तो आप समझ ही सकते हैं..]

नवगीत-पाठशाला ने कहा…

राजेन्द्र जी, 49 प्रशंसापत्र पहले से हैं यह मैंने आपका अर्ध शतक पूरा कर दिया। इसी उपलक्ष्य में ये चारों कवित्त (अगर बुरा न मानें तो) अनुभूति के वसंत व होली विशेषांक के लिये भेज दें। और हमारी नवगीत की पाठशाला में भी आएँ। अनेक शुभकामनाएँ!!

अल्पना वर्मा ने कहा…

अद्भुत !अद्भुत !अद्भुत!.....बासंती कवित्त!
लेखन तो आप का है ही प्रभावी.
पोस्ट सज्जा भी बहुत ही मन मोहक..
********आलाप...क्या कहने!
'अम्बूआ पे बोर...झूम झूम गीत गाऊं....'
आप ने तो शब्द चित्र ही बना दिया ...
भावपूर्ण गायन..बेहद सुन्दर ....
क्या बात!वाह!*******

कुमार राधारमण ने कहा…

पढ़ा भी,सुना भी। अब गुनगुना रहा हूं।

Dr Varsha Singh ने कहा…

सुन्दर वासंती रचना....
जिसे सँजोया आपने संगीत के स्वरों से ...
मर्मस्पर्शी एवं भावपूर्ण काव्यपंक्तियों के लिए कोटिश: बधाई !

Rajesh Kumar 'Nachiketa' ने कहा…

बहुत सुन्दर....

बौराई सी बौर झूमती, और लता मुस्काती है.
पुष्प श्रृजन करता है रस का औ गौरैया गाती है.
पथ पर पल्लव की शोभा है, कलियाँ द्वार सजाती हैं.
किसके स्वागत में है ये सब किसकी सवारी आती है

राजेश कुमार "नचिकेता"

Patali-The-Village ने कहा…

बड़े सुंदर बसंत के रंग| धन्यवाद|

ਸ਼ਿਆਮ ਸੁੰਦਰ ਅਗਰਵਾਲ ने कहा…

आपकी कविताओं में बसंत के सभी रंगो के दर्शन हो रहे हैं। बहुत ही सुंदर कविताओं के लिए बहुत-बहुत बधाई।

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत अच्छी रचना

नारी स्नेहमयी जननी

श्याम सखा 'श्याम' ने कहा…

तेरी रचना पढ़-सुन प्यारे राजेन्दर
हर्षित-पुलकित हुआ सकल दिग-दिगन्त है

Minakshi Pant ने कहा…

अब आपकी तारीफ में क्या - क्या लिखूं जितनी सुन्दर कविता उससे भी खुबसूरत स्पष्ट मधुर आवाज़ एक - एक शब्द मोती में पिरोया हो जैसे ! बहुत सुन्दर |
बहुत - बहुत बधाई हो दोस्त |

राजेश सिंह ने कहा…

बसंत जैसी ही सुंदर पोस्‍ट, बधाई.

udaya veer singh ने कहा…

priya rajendra ji ,
namskar ,
apki bhavmayi kavitt ka raspan kar
ritikalin kavya parampara ki yad aa
gayi .man -bhavani suhavani rachna .
achha laga . dhanyavad .

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

भाई राजेन्द्र जी आपकी काव्य प्रतिभा जितनी सुंदर है उतना ही सुंदर ब्लॉग की साज सज्जा |इस अद्भुत प्रतिभा के लिए आपको बधाई |

ममता त्रिपाठी ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता।
वसन्त के कलेवर में ढली हुई
वसन्त सी खिली हुई
स्वर में भी हरीतिमा
और सुगन्धि घुली हुई।

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

श्री राजेन्द्र स्वर्णकार जी।
मैंने आपके छंदों का रसास्वादन किया। भाव सुन्दर हैं। प्रस्तुति कलात्मक है। इन्हें प्रस्तुत करने हेतु आपको -साधुवाद! आपके आग्रह पर कुछ विचारनीय सम्मति भी रख रहा हूँ। ’काव्य’ एक कला है। ’चित्रकला’ एक दूसरी प्रकार की कला है। ’मूर्तिकला’ तीसरे प्रकार की कला है। इस प्रकार शास्त्रों में चौसठ प्रकार की कलाओं का उल्लेख किया गया है। नए जमाने की कलाओं के योग से यह संख्या और भी बढ़ सकती है। फिर भी सभी प्रकार की कलाओं में काव्य-कला को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसे ’ब्रह्मानंद सहोदरा’ माना गया है। कवि को भी इसी कारण मनीषी, परभू, स्वयंभू आदि उपाधियों से नवजा जाता है। अपनी रचना रचने के लिए कवि को किन्हीं उपकरणों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। उसका रचना संसार भाव, भाषा तथा शिल्प से निर्मित होता है। अतएव जिस कला में आप की अभिरुचि अधिक हो उसे मजबूती से पकड़़ने का यत्न करना अच्छा है।
@ हिंदी साहित्य में सवैया एवं घनाछरी छंदों में ऋतु-वर्णन को प्रमुखता से लिखा गया है। नवीन छंद गढ़ना कठिन है परन्तु आधुनिक भाव-बोध को सहेजना कवि के लिए कठिन नहीं।
@ सवैया एवं घनाछरी छंदों का अपना एक अनुशासन है। उन्हें आधार मान कर रचना करने से पूर्व रचनाकार को काव्य-परंपरा के साथ-साथ मात्राओं, गणों, यति-गति आदि का ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए।
@ हर भाषा का अपना व्याकरण होता है। उसके शब्द अपनी भाषा में प्रयोग करने की विवशता हो तो उन शब्दों को अपनी भाषा के अनुकूल साधारणीकरण कर लेना अच्छा होता है।
==========================
सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

राजेन्द्रजी,
देर से हाजरी दे पाने के लिये क्षमा चाहता हूँ । जितना सुन्दर गीत और उसकी प्रस्तुति है उतनी ही सुन्दरता से आपने अपने बनाये हुए माँ सरस्वती के चित्र के साथ ही अन्य चित्रों का भी चुनाव किया है । सुन्दर, अति सुन्दर...
और हाँ आपकी रसगुल्लों की फर्माईश फिलहाल तो ड्यू रही आप तक कैसे पहुँचाये जावें फिलहाल तो रास्ता तलाश रहा हूँ ।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

आपका मेल पहले ही मिल गया था , कुछ कारणों से नहीं आ सका था ! सर्वप्रथम धन्यवाद कि आप इस स्नेह के योग्य समझे मुझे !

कवित्त की तासीर तद्भव की है , इसलिए कहीं कहीं तालव्य 'श' जंच नहीं रहा | घनाक्षरी की मात्रा विधान छंदों में कहीं कहीं बिसरा है पर उसे आपने गाने के क्रम में आलाप से , बलाघात से , यति से भरसक भर दिया है ! तारीफ़ करूंगा आपकी आवाज की , अफ़सोस यह कि आप मुझसे बहुत दूर हैं नहीं तो आपसे कुछ चीजें सादर गवा लेता | भाव अच्छे भरे हैं आपने जिसपर अली जी की टीप मन मोग रही है |

आपके ब्लॉग पर बहुत समय बाद आया हूँ और एक गाने की बरबस याद आ रही है जिसे संभवतः आपने नहीं किन्हीं बाबू जी ने स्वर दिया है , खोजा पर मिला नहीं , आप लिंक भेजेंगे तो सुनूंगा और आभारी रहूंगा !

पंकज सुबीर ने कहा…

राजेन्‍द्र जी
मैं पढ़ चुका हूं और आग सुहाग वाला उपयोग बहुत सुंदर है ।
चारों कवित्‍त बढि़या बन पड़े हैं । वैसे मैं लगातार आपका ब्‍लाग पढ़ता हूं ।
किसी कारण से कमेंट कहीं नहीं करने का सोचा हुआ है इसलिये कमेंट नहीं करता हूं ।

सुबीर

श्यामल सुमन ने कहा…

क्या बात है राजेन्द्र जी - वाह। बहुत खूबसूरती से आपने वासंती छटा को शब्द और स्वर में उकेरा है।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

RAJWANT RAJ ने कहा…

adbhut
blog pr aa kr utsah vrdhan ke liye kotishh dhnywaad .

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

aapki awaaaj aur aapke dwara kavita ko post karne ka style..dono itna pyara hai ki kya kahen...badhai...:)

Madan Mohan 'Arvind' ने कहा…

आदरणीय राजेन्द्र जी,
आपकी रचनाएँ पढ़ते हुए वसंत आँखों के आगे साकार हो गया.
ऐसी सशक्त और भावपूर्ण रचनाओं के लिए बधाई.
सादर
मदन मोहन 'अरविन्द'

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

रंग बिरंगी कविता।

दीप्ति शर्मा ने कहा…

bahut sunder kavita
...

विरेन्द्र सिंह चौहान ने कहा…

आदरणीय राजेन्द्र जी सबसे पहले तो आपको सादर नमस्कार.....


आपकी इस रचना के संदर्भ में आई सभी प्यारी-प्यारी टिप्पणियों से सहमत हूँ। क्या उत्तम कोटि का
काव्य सृजन किया है आपने! सभी तस्वीरें सुन्दर हैं। शब्दों का चयन, उनकों भावानुसार रंग देना...दिमाग़ हिला देने व दिल लुभावने के लिए इतना बहुत है। बस एक ही बात मेरे मुख से निकल रही है कि भई वाह क्या बात है! बसंत ऋतु मेरी भी पसंदीदा ऋतु है।

आपको इस उत्तम कोटि के काव्य सृजन के लिए हार्दिक आभार.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

basant raag faguni aahat- bahut badhiyaa

मनोज कुमार ने कहा…

सरस गीत।

rashmi ravija ने कहा…

चारों कवित्त बेहद मनमोहक है...पूरे पोस्ट पर बासंती छटा छाई हुई है....सुन्दर रचनाओं के साथ सुन्दर तस्वीरों का संयोजन बहुत ही ख़ूबसूरत है.

Abnish Singh Chauhan ने कहा…

"मेरे उर में सखी बसंत है" - ऐसी भावना का जन्म होना कोई सामान्य बात नहीं है, बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है आपकी . आप बहुत बड़ा काम कर रहे हैं साहित्य के क्षेत्र में. मेरी बधाई स्वीकारें. अवनीश सिंह चौहान

डॉ टी एस दराल ने कहा…

भाई राजेन्द्र जी , हम तो गोवा की रंगीनियाँ ही देखते रहे और यहाँ सब रंगों की बसंत बहार का आनंद लेते रहे ।
ग़ज़ब की रचनाएँ हैं और उतना ही ग़ज़ब रंगों का मिश्रण । तितलियाँ -विशेषकर बहुत पसंद आई ।

खजुराहो की मूर्ति देखकर तो सचमुच सभी देव झूमने लगे हैं ।

हीर जी ने सही कहा है --आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं ।

नारी शक्ति पर कविता का इंतजार रहेगा ।

शालिनी कौशिक ने कहा…

aapke basant ne to vakai man ko bandh liya hai.bahut sundar.

शालिनी कौशिक ने कहा…

aapke basant ne to vakai man ko bandh liya hai.bahut sundar.

उस्ताद जी ने कहा…

बहुत सुन्दर आवाज पायी है आपने
अभी तो उस पर ही दिल अटका हुआ है

शुभ कामनाएं

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

# राहुल सिंह जी , धन्यवाद !

# विजय माथुर जी , आभार !

# निर्मला कपिला जी , आशीर्वाद बना रहे !

# रचना दीक्षित जी , शुक्रिया !

# ताऊ जी , वरद हस्त म्हारै सिर पर राखण खातर घणो आभार !

# वंदना जी , हार्दिक आभार !
क्षमा करें इस बार कविसम्मेलनीय व्यस्तता के कारण चर्चामंच पर आभार व्यक्त करने नहीं आ पाया ।

# भूषण जी , शुक्रिया !

# महेन्द्र वर्मा जी , हृदय से आभार स्वीकार कीजिएगा ।

# दीपक सैनी जी , आपके आने से मैं आश्वस्त हुआ … शुक्रिया !

# ज्योति सिंह जी , रचना लिखना सार्थक हुआ … आभार !

# संगीता स्वरूप जी , हार्दिक आभार ! पोते की दादी बनने पर पुनः बधाई !

# अनिता जी , आप आ'कर परख लें तो रचना स्वयं धन्य हो जाती है ।

# केवलराम जी , शुक्रिया !

# कैलाश जी भाईसाहब , आप जैसे गुणी की परख-दृष्टि से रचनाएं आगे भी आशीर्वाद पाती रहे , यही कामना है । आभार !

# अरुण रॉय जी , धन्यवाद !

# शाहिद साहब , शब्द संयोजन , शिल्प सौष्ठव पर आप जैसे शब्दशिल्पी के मुंह से सुनना और सौभाग्य की बात होती … :) आभार !

# अरविंद मिश्र जी , आप आए बहार आई …

# sagebob , मुझे ब्लॉग दुनिया के बसंत देव उपाधि से सम्मानित करने के लिए कृतज्ञ हूं …
स्नेह बनाए रहें , आभार !

# एस एम हबीब साहब , आपका स्नेह अभिभूत करता है … शुक्रिया !

# राज भाटिया जी , बचपन में बनाए चित्र को और रचना को पढ़ सुन कर आपने पसंद किया … आभार !

# आशा अम्मा , आपकी आशीषें मिलती रहें , बस … प्रणाम !

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

# मनोज जी , सच में एक निश्चय के साथ काव्य सृजन प्रारम्भ किया था
कि उबाऊ रचनाओं से उकता चुके कविता पाठकों के लिए मां सरस्वती से प्रसाद मांगता रहूंगा …
आप जैसे तटस्थ गुणी मेरे सृजन कर्म को परखते रहें … और मैं और श्रेष्ठ करने की प्रेरणा और ऊर्जा पाता रहूं …

# शास्त्री जी , आपका आशीर्वाद बना रहे … बस

# दानिश जी , आप जैसे सिद्धहस्त छंद के रचनाकार और पारखी द्वारा मेरी रचना को अलौकिक और दिव्य कृति कहना मेरे लिए बड़े ऐकेडेमिक अवार्ड से कम नहीं … नमन !

# अनुपमा जी , आप स्वयं श्रेष्ठ गीत लिखती हैं , आपकी कसौटी पर खरा उतरना मेरा सौभाग्य है , आभार !

# सतीश जी , मुझसे बेहतर और कौन है ! :) … आप हैं न ! आभारी हूं …

# नीरज जी भाईसाहब , आपकी स्नेह दृष्टि सबको ऊर्जावान बना सकती है … मुझे तो आपका आशीर्वाद हमेशा ही भरपूर मिला है । … पूरा विश्वास है , आगे भी मिलता रहेगा … प्रणाम !

# प्रतिभा सक्सेना जी , आप जैसी विशेषज्ञ विदुषी द्वारा रीति काल के पद्माकर आदि कवियों के साथ मेरी तुलना मन को आह्लादित तो कर रही है ,
साथ ही और उत्तरदायित्व से सृजन के लिए सजग भी कर रही है । कृपया, अपनत्व बनाए रहें … प्रणाम !

# दिव्या श्रीवास्तव जी ,चित्र और रचना दोनों को पसंद करने के लिए आभार !

# रवीन्द्र प्रभात जी , बहुत समय बाद आपके पधारने पर ख़ुशी हुई … आभार !

# सदा जी , हृदय से आभारी हूं आपके आने का शुक्रिया !

# डॉ.दलसिंगार यादव जी , प्रणाम ! आपका आना मेरा सौभाग्य है … स्नेहाशीष में कमी न करें …

# डॉक्टर साहब कौशलेन्द्र जी , आपके अंदाज़ पर तो फ़िदा हो गए हम !
कितनी सूक्ष्मदृष्टि से आपने देखा-सुना जांचा-परखा है !
अगली बार आपकी बहुत प्रतीक्षा रहेगी याद रखिएगा । आभार !

# रंजना जी , आप जिसका उत्साह बढ़ादें वो ज़र्रा भी ख़ुद को सितारा मान लेता है … :)
शुक्रिया !

# कुसुमेश जी , सब कुछ परखने तौलने के लिए आभारी हूं …

# सत्यम शिवम जी , स्वागत है … समर्थन के लिए भी आभार !
आऊंगा आपके यहां शीघ्र ही …

# देवेन्द्र गौतम जी ,
आप जैसे सच्चे सृजनधर्मी , छंद के पारखी रचयिता द्वारा मेरी रचना को कालजयी रचना कहना , बहुत बड़ा अवार्ड रिवार्ड है !
नतमस्तक हूं ।

# सुरेन्द्र सिंह जी , आप जैसे गुणी का कहीं पधारना अपने आप में गर्व की बात है …
आप भी बस , … अंक देने में मुझसे भी अधिक ही उदार र्हैं । आभार !

# ज्ञानचंद मर्मज्ञ जी , आपकी शुभकामनाएं पाकर धन्य हूं , आभार !

# अली भाईजान , आप द्वारा आ'कर इतने विस्तार से कुछ कहने का अर्थ है भगवान ने छप्पर फाड़ कर दौलत दे दी ।
अहोभाग्य ! आपका कहना कि यह ऋतु गान एक अदभुत दर्शन जैसा प्रतीत हुआ बहुत बड़ा ख़ज़ाना है मेरे लिए !
शब्द ही नहीं हैं मेरे पास आभार के लिए …

# गिरीश पंकज भाई जी , आपकी प्रतिक्रिया के बाद स्वयं को सितारों की दुनिया में महसूस कर रहा हूं …
इस वक्त अपने देश मे इक्का-दुक्का लोग ही होंगे जो इतना सुन्दर लिखे और उससे बेहतर गायन करे
… और इसके साथ और भी बहुत कुछ कहना … पांव ज़मीं पर नहीं पड़ रहे … हाऽऽहा !
बस, स्नेह देते रहें ताकि और श्रेष्ठ करने की प्रेरणा मिलती रहे … प्रणाम !

# संजय दानी जी , दिल बहल गया मेरा आपके आ जाने से … शुक्रिया ! फिर अवश्य आइएगा …

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

बन्धुवर राजेन्द्र जी तबीयत खुश कर दी आपने| जय हो|

हार में ही छुपी जीत को इसारौ यै बसंत है
चहूँ दिसि मदन की मस्ती कौ आभास है
देव महादेव जब झूमन लागे

आज के दौर में घनाक्षरी को पढ़ना जैसे सचिन तेंडुलकर को अपने सामने खेलते हुए देखना| आब को बहुत बहुत साधुवाद बन्धु|

आप और आप की मित्र मंडली को दोहा छंद पर आधारित समस्या पूर्ति में आमंत्रित करता हूँ

http://samasyapoorti.blogspot.com/2011/02/1-2.html

Basant ने कहा…

Hi Your Work very Good . I Like And Appreciate Keep it up .

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Thanks & Ragard
Neha Varma

' मिसिर' ने कहा…

राजेन्द्र जी ,सबसे पहले विलम्ब के लिए क्षमा चाहूँगा ,
बेटी की शादी ५ मई को होनी है ,उसी में लगा हुआ हूँ !
बसंत पर आपके छंद पढ़े ,बहुत अच्छे लगे ! मेरे लिये
तो छंद में लिखना सदा कठिन रहा ,इसलिए मैंने अधिक
प्रयास भी नहीं किया ! अपनी गति तो छंदमुक्त कविता में
ही है ! अतः अधिकार पूर्वक कुछ अधिक नहीं कह पाऊंगा ,
फिर भी कही-कहीं लय में थोड़ी कसर मुझे लगी ,जो
प्रवाह में पढ़ने पर पता चलती है ! देखियेगा ! भाव की
दृष्टि से छंद सुन्दर लगे ,जिसके लिए आपको बधाई !

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

# हरकीरत 'हीर'जी ,स्वयं इतनी नामचीन रचनाकार होने के बावजूद
किस सहजता से आपने कह दिया आप तो गुरुजन्य हैं ....! गुणी वही है जिसमें विनम्रता हो ।
अन्यथा , दंभी लोग घर में नहीं तो बाहर भी वैमनस्य पैदा करने के प्रयास करते पाए जाते हैं ,
चाहे स्वयं श्रेष्ठ कभी न भी कर पाए हों … ईश्वर आपका जीवन सुखमय बनाए … आमीन !
…और मैं जो हूं वही ठीक हूं … :)

# वाणी जी , आभारी हूं । भळै पधारता रैइजो सा … :)

# प्रतुल जी , मां सरस्वती मुझसे कुछ न कुछ करवाती रहती हैं …
इस लिंक पर सुनें कवित्त का एक और अलग ही रूप
चौमासै नैं रंग है!
राजस्थानी भाषा में वर्षा ॠतु का वर्णन है ( संप्रेषित अवश्य होगा , अर्थ दिया हुआ है )

आदरणीय काकाश्री को मेरा प्रणाम !
… बहुत ख़ुशी होगी ,आप उनके द्वारा सस्वर पाठ किए गए कवित्त सवैये अपने ब्लॉग पर लगाइए न कभी !
आप जैसे काव्य मर्मज्ञ आते रहें , यह मेरा परम सौभाग्य है … आभार !

# डॉक्टर साहिबा शरद सिंह जी ,:) ईश्वर की कृपा है …
आप कृपया आइंदा भी प्रेरणा और प्रोत्साहन देने पधारती रहें …

# सांझ ,आपका शुक्रिया किन शब्दों में करूं ?
ur a truly gifted man sir....pleasure reading u
इतने प्यारे कमेंट पाने के बाद दिग्भ्रमित न हो जाऊं कहीं … मन की गहराई के साथ आभार !

# संतोष त्रिवेदी जी, अनेकशः धन्यवाद !

# सतीश सत्यार्थी जी , बहुत बहुत धन्यवाद ! आभार !
[ आप गूगल क्रोम ब्राउजर का इस्तेमाल करके देखें , ज़रा भी समय नहीं लेता लोड होने में ]

# मान्यवर : नवगीत-पाठशाला , आपका आगमन मेरे लिए गर्व और हार्दिक प्रसन्नता की बात है ।
अब शीघ्र ही भेजता हूं ये कवित्त , अनुभूति के वसंत व होली विशेषांक के लिये
… चूक हो रही है … नवगीत की पाठशाला में प्रवेश भी यथाशीघ्र लेने पहुंच रहा हूं …

# अल्पना वर्मा जी , आभार ! आभार ! आभार !
आपकी टिप्पणी मेरे लिए हमेशा ऊर्जा का भण्डार साबित हुई है
एक सुरीली ख़ूबसूरत रचनाकारा से प्रशंसा पाना सौभाग्य की बात है । आभार … कि आप अपनी अतिशय व्यस्तता के बीच भी
समय निकाल कर मेरे उत्साहवर्द्धन के लिए पधारीं …

# कुमार राधारमण जी , स्वागतम !पहली बार आए हैं आप !
कृपया , आगे भी आया कीजिए …

# वर्षा सिंह जी, स्वागत है शस्वरं के समर्थन ( फॉलो ) के लिए !
स्नेह सद्भाव सदैव बनाए रहें … आभार !

# राजेश नचिकेता जी , बहुत सुंदर ! आपका हमेशा इंतज़ार रहता है , आते रहें , कृपया !

# Patali-The-Village , आपका भी स्वागत ! आभार !

# श्याम सुन्दर अग्रवाल जी , आपके आने का शुक्रिया !आगे भी इंतज़ार करूंगा …

# मिथिलेश जी , आभार ! कोई वर्ष भर पहले मोबाइल पर बात करने के बाद से आपने मुझे भुला ही दिया …
अब नये सिरे से याद करने का आभार ! … अब प्रतीक्षा रहा करेगी आपकी हमेशा …

# श्याम सखा श्याम जी , आभार !
मसि कागद के कुछ अंक और आपके सुंदर हस्ताक्षर युक्त कुछ पत्र अब भी मेरे पास सुरक्षित हैं …

# मीनाक्षी पंत जी , आपसे अपनी तारीफ़ सुनना बहुत अच्छा लगा दोस्त !
इंतज़ार करता रहूंगा हर पोस्ट पर आपका … ;)

# राजेश सिंह जी , शुक्रिया ! आभार !… आइएगा फिर

# उदय वीर सिंह जी , ये कवित्त आपको रीतिकालीन काव्य परंपरा की याद दिलाने में समर्थ हुए , मेरी लेखनी सार्थक हुई … आभार !
आते रहें आगे भी …

# जयकृष्ण राय तुषार जी , आपके उद्गार मेरी निधि है … आभार !

# ममता त्रिपाठी जी , स्वागत ! इस पोस्ट पर बहुत प्रतीक्षा थी आपकी …
धन्य हुआ … आभार !

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

# डंडा लखनवी जी , पधारने का धन्यवाद !

पोस्ट से इतर बातों का क्या अभिप्राय लूं ?

* "अपनी रचना रचने के लिए कवि को किन्हीं उपकरणों की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।"
आपके इस कथन का मंतव्य यह समझा जाए कि पहले साज सज्जा , चित्र और रंग और गायन जैसे उपकरण जुटाए गए , तत्पश्चात् इन कवित्त का सृजन हो गया ?
क्या सोने पर सुहागा की अर्थवत्ता मात्र कपोल कल्पना है ?
एक ही व्यक्ति की धमनियों और आत्मा में विविध कलाएं हों,तो ईश्वर-प्रदत्त बहुआयामी कलाओं का त्याग कर देना चाहिए ?
भाव, भाषा तथा शिल्प से निर्मित रचना की साज-सज्जा वर्जित है ?…लज्जाजनक कृत्य है ?

और हां , मनहरण कवित्त तो मात्रिक नहीं वार्णिक छंद है !
यहां प्रस्तुत मेरे लिखे कवित्त काव्य कसौटी अथवा आपकी कसौटी पर जहां त्रुटिपूर्ण समझते हैं , स्पष्ट बतलाते तो अधिक श्रेयस्कर होता ।
डंडा चलाना ही चाह रहे हैं तो हुज़ूर , लखनवी नज़ाक़त-नफ़ासत छोड़ कर खुल कर चलाएं न !

बहरहाल , इतने कष्ट और श्रम के साथ पांडित्य प्रदर्शन के सुंदर प्रयास को प्रणाम ! आपके प्रति कोटिशः आभार !

# सुशील बाकलीवाल जी , प्रोत्साहन हेतु आभार !
:) रसगुल्लों की फर्माईश पर ज़्यादा चिंता न करें … आपके वहां आ'कर शीघ्र पार्टी लेंगे … हा हाऽऽ ह !

# अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी , आभारी हूं … !

* घनाक्षरी की मात्रा विधान छंदों में कहीं कहीं बिसरा है

मनहरण कवित्त तो मात्रिक नहीं , वार्णिक छंद है । आप कहां क्या खामी महसूस करते हैं ?
समय हो, और बतलाना उचित समझें तो स्पष्ट करें , कृपया !

* आप मुझसे बहुत दूर हैं नहीं तो आपसे कुछ चीजें सादर गवा लेता |

दूरी मन से न हो तो बहुत सामीप्य है … :) आप आदेश करें … मेरा सौभाग्य होगा कुछ संभव हो सका तो …
जैसा हूं वैसा तो हाज़िर ही हूं , कइयों की रचनाएं गा'कर भेजी है , और भी गाने के लिए राह देख रही हैं …

* एक गाने की बरबस याद आ रही है जिसे संभवतः आपने नहीं किन्हीं बाबू जी ने स्वर दिया है ,
खोजा पर मिला नहीं , आप लिंक भेजेंगे तो सुनूंगा और आभारी रहूंगा !

संभवतः इन दो लिंक में से एक पर जो गीत है आप उसकी बात कह रहे हैं …

आए न बाबूजी
यह रचना अन्य रचनाओं की तरह मेरी अपनी ही है , जो मेरे ही स्वर , मेरी ही कंपोजीशन में है

तुम जितना मधु घोल रही हो

विष्णु खन्ना जी का लिखा यह गीत श्री रामेश्वर आनन्द जी ने स्वयं अपनी कंपोजीशन में गाया है


# पंकज सुबीर जी , गत वर्ष आपके ब्लॉग के होली तरही मुशायरे के लिए ग़ज़ल लिखने के साथ मेरा नेट पर लिखना शुरू हुआ था …
आभारी हूं आपका !

# श्यामल सुमन जी , बहुत बहुत शुक्रिया !

# राजवंत राज जी ,आभार ! अब आवागमन का सिलसिला बना रहे…

# मुकेश सिन्हा जी , मेरी आवाज़ और स्टाइल पसंद करने के लिए आभार !

# मदन मोहन अरविंद जी , मान वर्द्धन के लिए आभार ! मेल का भी शुक्रिया !
आप आते रहें … बहुत प्यार से इंतज़ार रहता है …

# प्रवीण पांडेय जी , :) … … …

# दीप्ति जी, Thanks … आते रहें …

# विरेन्द्र जी , आप न आते तो पोस्ट अधूरी - सी रहती , शुक्रिया !
ये दिल तुम्हारे प्यार का मरा है दोस्तों …

# रश्मिप्रभा जी , आभार ! कई बार विस्तार कुछ नहीं कह पाता , संक्षेप बहुत कुछ कह देता है … :)

# मनोज जी , आभार !

# रश्मि रविजाजी , आप जैसी बहुमुखी प्रतिभा की धनी रचनाकार का पधारना , उत्साह वर्द्धन करना बहुत सौभाग्य की बात है …
हार्दिक आभार ! नमन !

# अवनीश जी , आप जैसे गुणी समीक्षक का कुछ भी कहना बहुत महत्व रखता है …
आ'कर मान और उत्साह बढ़ाते रहें , … आभार !

# डॉ.टी एस दराल साहब , ओऽऽहो ! तो आप गोवा की रंगीनियों में मज़े लूट रहे थे
… और हम आपके इंतज़ार में यहां आधे हुए जा रहे थे … :)
आपके आते ही माहौल और बासंती महसूस होने लगा , शुक्रिया !
नारी शक्ति की रचना अवसर मिलते ही पोस्ट पर समझें …

# शालिनी जी ,… मन बंध गया है … आभारी हूं !
देखिए , अब आपको बार बार यहां देखने की इच्छा रहेगी …
यथासुविधा आने का प्रयास कीजिएगा …

# उस्ताद जी, स्वागत ! स्वागत ! बहुत डर गया था आपको देखते ही …
लेकिन बसंत की मेहरबानी से आज आपने खिंचाई नहीं की … :) शुक्रिया !
कृपया, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें …

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

# नवीन जी , आप स्वयं छंद के समर्थ रचनाकार हैं … बहुत आभार !
कुछ व्यस्तताओं के कारण आपके वहां हाज़िर नहीं हो पा रहा … शीघ्र ही आऊंगा ।

# मिसिर जी , आपका पधारना ही परम सौभाग्य की बात है …
मेरी बहन की शादी की अग्रिम शुभकामनाएं स्वीकार करें !
परमपिता परमात्मा समस्त् मांगलिक कार्य भली भांति संपन्न कराएंगे !

आपका सुझाव सर माथे पर … आशीर्वाद दें कि और श्रेष्ठ कर सकूं …
प्रणाम !

"पलाश" ने कहा…

बसंत के रंग बहुत सुन्दरता से सजाए है आपने ।

Rajesh Kumari ने कहा…

vasant ritu ki kavita adbhut hai.aapki sari creation ek se badhkar ek hain.

क्षितिजा .... ने कहा…

आदरणीय राजेंद्र जी ... आपकी रचना सुन कर और पढ़ कर बहुत आनंद आया ... आपकी आवाज़ की गहराई दिल को छूती है ... और आपकी रचना के भाव और प्रस्तुति देखा कर लग रहा है मानो बसंत स्वयं आपके ब्लॉग में समां गया हो ... हार्दिक शुभकामनाएं

क्षितिजा .... ने कहा…

आपका बहुत बहुत धन्यवाद राजेंद्र जी ....मेरे श्रीमान जी फ़ौज में मेजर हैं ....उनकी अचानक temporary duty आगई तो उनके बाहर साथ चली गयी थी ... इन्टरनेट न होने की वजाह से ब्लॉग्गिंग से दूर थी .. अब वापिस आगई हूँ .. एक नयी पोस्ट भी डाली है ब्लॉग पर ... समय निकाल कर ज़रूर आशीर्वाद देने पधारियेगा ... शुभकामनाएं

शिवकुमार ( शिवा) ने कहा…

राजेंद्र जी नमस्कार ,
आपकी आवाज आपकी कविता को चार चाँद लगा देते है,बसंती कविता की रंगीनीयत भी सुन्दर है,
आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ आकर बहुत अच्छा लगा .
कभी समय मिले तो http://shiva12877.blogspot.com ब्लॉग पर भी आप अपने एक नज़र डालें . धन्यवाद् .

sandhya ने कहा…

राजेन्द्र जी - वाह..बहुत खूबसूरती से आपने वासंती छटा को शब्द और स्वर में उकेरा है। ऐसा प्रतीत होता है, बसंत आपके ब्लॉग पर स्वयं प्रकट हो गया हो ..

M.A.Sharma "सेहर" ने कहा…

Beautiful picture of Goddess Saraswati, nice writeup n great voice !!

Keep writing ,keep sharing !

'अदा' ने कहा…

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है आपकी...एकदम रंग बिरंगी...
अच्छा लगा यहाँ आना...और आपकी आवाज़ तो बस माशाअलाह है..
आपका शुक्रिया..

'अदा' ने कहा…

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है आपकी...एकदम रंग बिरंगी...
अच्छा लगा यहाँ आना...और आपकी आवाज़ तो बस माशाअलाह है..
आपका शुक्रिया..

Udan Tashtari ने कहा…

कवित्त भी रुत के समान ही मनभावनी है, बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ.

आपकी आवाज ने आनन्दित कर दिया.

amrendra "amar" ने कहा…

बहुत सुन्दर तस्वीर और हार्दिक शुभकामनाएं

AJMANI61181 ने कहा…

basant ritu par sunder prastuti

sir ji meri basant ritu par likhi kavita ka adhayyan kar guide line karenge dhanyawaad

aur bhagat sukhdev raajguru kavita par pratikiya ke liye thanx

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

poora mahaul basanti ho gaya rajendr ji ,
blog jagat is blog ke karan basanti bayar se itr amez ho gaya
bahut sundar kavitt hain sare visheshtaya doosra wala ,bahut ravani hai ismen

vasant ritu ke sath sath mahashivratri ki bahut bahut badhai

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

poora mahaul basanti ho gaya rajendr ji ,
blog jagat is blog ke karan basanti bayar se itr amez ho gaya
bahut sundar kavitt hain sare visheshtaya doosra wala ,bahut ravani hai ismen

vasant ritu ke sath sath mahashivratri ki bahut bahut badhai

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

kavita ki taarif karun , ya aapke blog ki ya aapke dwara gaye chune hue rango ki ,, kya kahun ,, man me bas gayi aapki ye kavita ,meri shubhkaamanye sweekar kare..

SURINDER RATTI ने कहा…

Rajender Ji,

Namaskaar,

Basanti Kavitt Bahut Hi Man Bhyaa, Badhaai.

Surinder Ratti
Mumbai

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

राजेन्द्रजी,

105 टिप्पणियों के बाद कुछ बचता है क्या लिखना? सच कहूं तो आपकी रचनायें मुझे हिन्दी के श्रेष्ठतम कवियों की याद दिला जाती हैं। जब मैं यह पढ रहा था तो यकायक मुझे हरिऔध जी की स्मृति हो आई, उनकी कुछ पंक्तियों ने मुझे नहला सा दिया...कि- " अलिकुल अहै केलि-रत बन पुलकित,

द्रुम बना नवल दलों से छबिवंत है।

मंद मंद बहत मनोरम समीर अहै,

सरस सुवास से सुवासित दिगंत है।

'हरिऔध' रसिक-समूह मंजु मानस कौ,

मोहित करत रति-कामिनी कौ कंत है।

कंज कलितांगन मैं ललिता लतागन मैं,

बनन मैं बागन मैं बगर्यो बसंत है।"

बसंत रितु पर बासंती रस प्राप्त हुआ। धन्यवाद। देर से आया आपके ब्लॉग पर क्षमा चाहूंगा।

Avinash Chandra ने कहा…

सभी कवित्त अत्यंत सुन्दर हैं और चित्र भी बहुत मनमोहक।
और आपकी आवाज पर कुछ कहना मेरे लिए संभव नहीं।

शुभकामनाएँ इस काव्य को, उल्लास को!
आभार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीय अविनाश चंद्र जी
नमस्कार !

आपसे संपर्क के लिए कोई सूत्र नहीं मिल रहा , न तो आपके ब्लॉग पर टिप्पणी का ऑप्शन है , न ही आपकी मेल आईडी है … संभव हो तो इस संदेश को देखने के बाद संपर्क करें मेल भेज कर ।

यह संदेश तो आपका संपर्क सूत्र मिलते ही मिटा दूंगा …

devmani pandey ने कहा…

प्रिय भाई राजेंद्र, बसंत की तरह सारे कवित्त रंग-बिरंगे और मनभावन हैं। आपके यहाँ शब्द,भाव और दृश्य का बहुत सुंदर और कलात्मक तालमेल है। बधाई ! आपने तो पदमाकर की याद दिला दी- बनन में, बागन में, बागरयो बसंत है....

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

राजेन्द्रजी,
यकीन मानिये आपकी आवाज़ ने मुझे मोह लिया।
देर रात तक सुनता रहा "पवन सुहावनी है........"
सुनता रहा..सुनता रहा...और आवाज़ की जो कशिश है उसमे खोया रहा।
बहुत दिनों बाद किसी आवाज़ ने मुझे आनंद दिया है। ईश्वर आपको हमेशा सफल रखे।
यह सिर्फ उसकी ही कृपा है जो लेखन, कला के साथ साथ उसने आपको आवाज़ भी सौंपी है..।
आप निश्चित रूप से धन्य हैं।
उसकी कृपा को सदमार्ग पर लगाये रखें।

अमिताभ


जो राह चुनी तूने उसी राह पे राही चलते जाना रे...

Giribala ने कहा…

बहुत ही रंगीन ब्लॉग है आपका!! छोटे बच्चों का स्कूल याद आ गया. आशा करती हूँ ऐसी रंगीनियाँ मेरे देश के गरीब लोगों के जीवन में भी भर जाएँ!

arun mishra ने कहा…

प्रिय राजेन्द्र जी,
शस्वरं पर आपके वासन्ती कवित्त पढ़े/सुने। सभी अच्छे हैं।
आपका मुग्ध कर देने वाला घन-गम्भीर स्वर गज़ब का आकर्षण रखता है।
छन्द-प्रवाह पढ़ने की अपेक्षा सुनने में अधिक है। तीसरे कवित्त के प्रथम चार पंक्तियों में अपेक्षाकृत बेहतर छन्द-प्रवाह है।
बेहतरी की गुंजाइश सभी में और सदैव रहती है। कविता के प्रति आपकी लगन और प्रयास दोनो ही सराहनीय हैं।

मैं आपका प्रशंसक हूं । शुभकामनायें।

- अरुण मिश्र.

पुनश्च : कनेक्टिविटी की समस्या के कारण उत्तर देने में विलम्ब हुआ है,
क्षमा करेंगे।

***Punam*** ने कहा…

राजेन्द्रजी....

१११ टिप्पणियों के बाद

मैं इसे टिप्पणी नहीं कहूँगी....!!
तारीफ कहा जाना उपयुक्त होगा !
शायद इसे पढ़ने का सही समय अब आया है मेरे लिए !!
पढ़ने के साथ ही लगा कि कोई खुशबू का झोंका
छू गया और आस-पास फूल ही फूल खिल गए....!!
आपकी आवाज़ में अभी नहीं सुन सकी हूँ,
समय निकाल कर फुर्सत में सुनूंगी....!!
अभी तो पढ़ कर जो आनंद आया है...
उसी को महसूस कर रही हूँ......!!

खूबसूरत के अलावा कोई शब्द नहीं है !!

KESHVENDRA ने कहा…

राजेंद्र जी, आपकी इस कविता को पढ़ कर मन बसंती हो गया. क्या सुंदर शब्द चयन और लय-ताल-छंद का ख्याल रखा है आपने...ऐसी जीवनगंधी कविताएँ ही कविता के प्रति लोगों की रूचि को बनाये रख सकती हैं. आपके लेखन-गायन-चित्रण के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

# अपर्णा जी 'पलाश' बासंती धन्यवाद ! :)

# राजेश कुमारी जी , मेरे सारे क्रिएशन को पसंद करने के लिए हृदय से आभारी हूं ।

# क्षितिजा जी , मेरे शब्द और स्वर आपको पसंद आते हैं , यह मेरा सौभाग्य है ।
आपको लगा 'मानो बसंत स्वयं मेरे ब्लॉग में समा गया हो' … और मैं जोड़ना चाहूंगा कि आप जैसे सुंदर सुगुणी के आने से बहार भी :)
साहब को मेरा नमस्कार कहिएगा … और कभी मेरी कोई रचना सुनने के लिए भी …

# शिवकुमार जी शिवा , हार्दिक स्वागत ! आगे भी आते रहें … अवश्य ही मैं आपके यहां आता रहूंगा ।

# संध्या जी , :) आपके आने से मेरे ब्लॉग की ख़ूबसूरती और बढ़ गई … शुक्रिया !

# "सेहर"जी , अपने आप को बहुत ख़ुशक़िस्मत मानता हूं …
आप गिनती के ब्लॉग्स पर जाती हैं
कवित्त का अंश आपके नाम …वारी जाऊं , निज भाग्य को सराहूं … :)

# अदाजी , ब्लॉग जगत की हसीनतरीन सुर साम्राज्ञी , जिनकी आवाज़ पर मैं फ़िदा … !
मेरी आवाज़ की ता'रीफ़ के लिए शुक्रिया , नवाज़िश !

# समीर जी , जहां आप पहुंच गए प्राणवायु स्वतः ही संचरण करने लगती है … :)
आपकी पुस्तकें मिल गईं … आभार !

# अमरेन्द्र जी , धन्यवाद !

# अजमानी जी , हार्दिक स्वागत ! अब तो आना जाना लगा ही रहेगा …

# इस्मत ज़ैदी जी , ब्लॉग जगत इस ब्लॉग के कारण बासंती बयार से इत्र आमेज़ हो गया आपके इस बिग कमेंट से निहाल हुआ … शुक्रिया !
आपको भी मंगलकामनाएं !

# विजय कुमार जी , अरे साहब , ता'रीफ़ आपकी जो यहां पधारे …

# सुरिंदर रत्ति जी , हार्दिक स्वागत ! अभिनन्दन !
आपके पुनः पधारने की प्रतीक्षा रहेगी …

# देवमणी पाण्डेय जी , आभारी हूं ।
आपका यह कहना किआपने तो पदमाकर की याद दिला दी आप जैसे विद्वान की ऐसी उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रिया मिलना गर्व और सौभाग्य की बात है ।

# अमिताभ जी , आपकी सूक्ष्म परख-दृष्टि का कायल हूं … आभार !
मेरे कवित्त पढ़ते हुए आप जैसे कलाविद समीक्षक को हरिऔध जी की स्मृति हो आना मेरी रचना को सरस्वती की ओर से बहुत बड़ा उपहार और आशीर्वाद है ।
हरिऔध जी की स्मृतियों को मेरा भी प्रणाम !
देर कुछ नहीं … आप आ कर देख लें तो तसल्ली हो जाती है …

और नेट समस्या के बावजूद दुबारा प्रोत्साहित करने में आपका मेरे प्रति अतिशय स्नेह है …

# अरुण मिश्र जी , प्रणाम ! आप जैसे छंद के उद्भट गुणी , सशक्त हस्ताक्षर आ'कर परखें तो लेखन निखरता है … आभार !

# पुनम जी , सुस्वागतम् ! इतने ख़ूबसूरत अंदाज़ में प्रतिक्रिया पा'कर गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं …
सच ये टिप्पणी नहीं , आपका स्नेह है … बड़प्पन है … अपनत्व है !
मन से आभारी हूं …

हां, समय निकाल कर सुनिएगा अवश्य !

# केशवेन्द्र जी , हार्दिक स्वागत है ! आप जैसे ख़ूबसूरत रचनाकार की प्रतिक्रिया पा'कर बहुत अच्छा लगा ।
यह सिलसिला बना रहे … आते रहें !

Udan Tashtari ने कहा…

आपको एवं आपके परिवार को होली की बहुत मुबारकबाद एवं शुभकामनाएँ.

सादर

समीर लाल

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

# आभारी हूं समीर जी ! आपको भी होली मुबारक !

योगेन्द्र पाल ने कहा…

आपको होली की हार्दिक शुभकामनाएं,

असल में आपका ब्लॉग "अपना ब्लॉग" में सम्मिलित नहीं है इसलिए आपके लेख नहीं पढ़ पाया

अच्छा लिखा है आपने

कमेन्ट में लिंक कैसे जोड़ें?

maheshwari kaneri ने कहा…

बसंत के सभी रंगो को सुन्दर ठंसे बिखेरा है धन्यवाद

dheerendra ने कहा…

वसंत का इतना सुंदर स्वागत आपने अपनी इस पोस्ट में किया है की तारीफ के लिये शब्द कम पड़ते है, बहुत बहुत बधाई!