ब्लॉग मित्र मंडली

12/12/12

कवि दो ही चालीस में , भांड मिले अड़तीस

वर्ष 2012 के 12वें महीने की 12वीं तारीख को 
12 बज कर 12 मिनट 12 सैकंड पर 
बार-बार लिख-मिटा कर लगाई गई इस प्रविष्टि से 
अपने पौ 12 पच्चीस होने की तो ख़ुशफ़हमी नहीं 
लेकिन कइयों की शक्ल पर 12 बजने लगे 
तो अपनी कोई गारंटी भी नहीं ।
J बस... आनंद के लिए J
12-12-12  के अद्भुत् संयोग के अवसर पर प्रस्तुत हैं 12 दोहे 
ये चिल्लर विद्वान
मिलीभगत छल को कहे शातिर काव्य-जुनून !
कवि कहलाते ; कर रहे जो कविता का ख़ून !!
भांड मसखरे नकलची सड़े चुटकुलेबाज़ !
इन सबका ही आजकल काव्यमंच पर राज !!
रटे लतीफ़े आ गए बासी बदबूदार !
करते फूहड़ हरकतें मंचों के खेलार !!
ना भाषा ना वर्तनी का भी जिनको ज्ञान !
शेखी झाड़े मंच पर ये चिल्लर विद्वान !!
बजे घने थोथे चने , लिये दंभ-अभिमान !
दूकानें तो खोल ली , पास नहीं सामान !!
श्रोताओं को फांसते फेंक चवन्नी-माल !
काव्य-साधना क्या करे ये ठनठनगोपाल !!
मौलिकता इनके लिए है जी का जंजाल !
इस-उसकी रचना पढ़े समझ बाप का माल !!
चार पंक्तियां काव्य की , मिनट चरे छत्तीस !
कवि दो ही चालीस में , भांड मिले अड़तीस !!
कूल्हे कुछ मटका रहे , कुछ गरदन उचकाय !
कविताएं फुस , नाच कर ये नाटक दिखलाय !!
बात-बात पर मांगते ये ताली की भीख !
बेहतर होता ढंग की कविता लेते सीख !!
कवि-सम्मेलन-नाम पर फूहड़ खी-खी खेल !
श्रोता-आयोजक भला कैसे लेते झेल ?!
ठेकेदार बिचौलिये मंचों के दल्लाल !
कविता का कितना बुरा और करेंगे हाल ?!
-राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar

यह वर्ष पूरा होने से पहले फिर मिलेंगे अवश्य
आप सबको
आगामी नव वर्ष 2013 की अग्रिम शुभकामनाएं !

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मेरे राजस्थानी ब्लॉग ओळ्यूं मरुधर देश री पर भी आपके स्वागतार्थ प्रतीक्षा है 
रचनाएं भावार्थ/शब्दार्थ सहित होने से राजस्थानी समझने में आप को असुविधा नहीं होगी
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