ब्लॉग मित्र मंडली

12/4/12

जब उतरा मैं घट के भीतर

आवर्त 
आज की रचना का रंग है आध्यात्म
         
कितनी गलियों-राहों ,
कितने पंथों पर चल देखा !
नगर-नगर और द्वार-द्वार  
बस, स्वार्थ और छल देखा !!
कितने सागर, कितनी नदियां,
कितना  नीर  तलाशा !
व्याकुल मन को थाह मिली ना, 
है प्यासा का प्यासा !!
कितने पूजन-व्रत किए,
और कितना ध्यान लगाया !
कितने मंदिर-तीरथ घूमा, 
पर तू नज़र न आया !!
कितने गुणियों, साधु-संतों को
पढ़-सुन कर देखा !
पढ़ ना पाया भाग्य की रेखा, 
और कर्मों का लेखा !!
कितने ज्ञानी-ध्यानी,
कितने योगी-जोगी ध्याए !
हृदय रहा अतृप्त-अशांत ही, 
कोई काम न आए !!
कितने साधन जतन किए,
और कितनी लगाई युक्ति !
कसते ही गए बंधन पल-प्रतिपल, 
मिल ना पाई मुक्ति !!
जब उतरा मैं घट के भीतर
गोता उतर लगाया !
स्व खोकर सर्वस्व पा लिया; 
परमानंद मुस्काया !!
-राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar
Candle
मैं हृदय से आभारी हूं आप सबके प्रति
निभाते रहें
नमन