आवर्त
कितने पंथों पर चल’ देखा !
नगर-नगर और द्वार-द्वार …
बस, स्वार्थ और छल देखा !!
बस, स्वार्थ और छल देखा !!
कितना नीर
तलाशा !
व्याकुल मन को थाह मिली
ना,
है प्यासा का प्यासा !!
है प्यासा का प्यासा !!
और… कितना ध्यान लगाया !
कितने मंदिर-तीरथ घूमा,
पर तू नज़र न आया !!
पर तू नज़र न आया !!
पढ़-सुन कर देखा !
पढ़ ना पाया भाग्य की
रेखा,
और कर्मों का लेखा !!
और कर्मों का लेखा !!
कितने योगी-जोगी ध्याए !
हृदय रहा अतृप्त-अशांत
ही,
कोई काम न आए !!
कोई काम न आए !!
और… कितनी लगाई युक्ति !
गोता उतर’ लगाया !
स्व खो’कर सर्वस्व पा लिया;
परमानंद मुस्काया !!
परमानंद मुस्काया !!
-राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar
मैं हृदय से आभारी हूं आप सबके प्रति
निभाते रहें
नमन

