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12/4/12

जब उतरा मैं घट के भीतर

आवर्त 
आज की रचना का रंग है आध्यात्म
         
कितनी गलियों-राहों ,
कितने पंथों पर चल देखा !
नगर-नगर और द्वार-द्वार  
बस, स्वार्थ और छल देखा !!
कितने सागर, कितनी नदियां,
कितना  नीर  तलाशा !
व्याकुल मन को थाह मिली ना, 
है प्यासा का प्यासा !!
कितने पूजन-व्रत किए,
और कितना ध्यान लगाया !
कितने मंदिर-तीरथ घूमा, 
पर तू नज़र न आया !!
कितने गुणियों, साधु-संतों को
पढ़-सुन कर देखा !
पढ़ ना पाया भाग्य की रेखा, 
और कर्मों का लेखा !!
कितने ज्ञानी-ध्यानी,
कितने योगी-जोगी ध्याए !
हृदय रहा अतृप्त-अशांत ही, 
कोई काम न आए !!
कितने साधन जतन किए,
और कितनी लगाई युक्ति !
कसते ही गए बंधन पल-प्रतिपल, 
मिल ना पाई मुक्ति !!
जब उतरा मैं घट के भीतर
गोता उतर लगाया !
स्व खोकर सर्वस्व पा लिया; 
परमानंद मुस्काया !!
-राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar
Candle
मैं हृदय से आभारी हूं आप सबके प्रति
निभाते रहें
नमन

54 टिप्‍पणियां:

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

bahut gahre bhav.....bahut acchi prastiti rajendra jee.....

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

kuch gadbad ho rha hai.....bahut acchi prastuti....rajendra jee...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अपने घट में उतरना ही तो सबसे कठिन काम है .... बहुत सुंदर और सार्थक संदेश देती अच्छी रचना

mridula pradhan ने कहा…

bahut bhawpoorn rachna.....khoob pasand aayee.

Maheshwari kaneri ने कहा…

सार्थक संदेश देती सुन्दर रचना.....

संध्या शर्मा ने कहा…

बहुत कठिन है उस परमानन्द को प्राप्त करना जिसे आपने स्वयं के भीतर पा लिया... धन्य है ऐसी आत्मा को हमारा शत-शत प्रणाम... बहुत सुन्दर रचना

Brijendra Singh... (बिरजू, برجو) ने कहा…

sarthak rachna Rajendra Ji..Badhai !!

डॉ टी एस दराल ने कहा…

रचना पढ़ते पढ़ते जो भाव मन में आ रहे थे , वे आखिरी पंक्तियों में आपने ही लिख दिए .
क्यों ढूंढें इत उत , ढूंढों बस स्व चित !

सुन्दर प्रस्तुति .

वन्दना ने कहा…

चलिये आप वहाँ तक पहुँच तो गये

ऋता शेखर मधु ने कहा…

बहुत अच्छी रचना...
हम तो बस हैं आत्मा
सब कुछ है परमात्मा...
यही भाव मन को शांति देती है.

dheerendra ने कहा…

हम तो बस हैं आत्मा सब कुछ परमात्मा है ...
बहुत अच्छी अध्यात्मिक अभिव्यक्ति,सुंदर रचना,

MY RECENT POST ...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

RITU ने कहा…

स्वयं में ही है वो..
बहुत सुन्दर कविता
कलमदान

baddimag ने कहा…

नस्वर संसार की सस्वर अभिव्यक्ति
वह बहुत सुन्दर

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

वाह क्या बात है!!! बहुत ख़ूब

baddimag ने कहा…

नस्वर संसार की सस्वर अभिव्यक्ति
वह बहुत सुन्दर

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

वाह क्या बात है!!! बहुत ख़ूब

Anupama Tripathi ने कहा…

बहुत बधाई एवं शुभकामनायें ...!!
कविता के भाव गहरे हैं और खूबसूरती से चित्रण किया है ...!!

सदा ने कहा…

गहन भाव लिए बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

Anuvart Shpahura Gopal Pancholi ने कहा…

भूल -भटक कर जो- जो भी उतरा घट के भीतर
उसने पाया मृग ज्यों क्स्तुरी को अपने ही भीतर



Anuvart Shpahura Gopal Pancholi

शालिनी कौशिक ने कहा…

ham to prashansa karne yogya bhi nahi hain rajendra ji.bahut bahut sundar ,sundar prastuti..''manzil pas aayegi

मदन शर्मा ने कहा…

सार्थक कविता कही है आपने ....किसी ने क्या खूब कहावत कही है बगल में बबुआ ढूढे फिरे गली गली ....ईश्वर तो अपने अंदर ही है फिर भी इसे न समझते हुवे हम हर जगह मंदिरों एवं मस्जिदों में ढूढते फिरते हैं

Sushil Kumar Joshi ने कहा…

स्व खोकर सर्वस्व पा लिया
बहुत सुंदर !

रविकर फैजाबादी ने कहा…

आज शुक्रवार
चर्चा मंच पर
आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति ||

charchamanch.blogspot.com

sushma 'आहुति' ने कहा…

यार्थार्थ को दर्शाती अभिवयक्ति.....

Nisha Kothari ने कहा…

जब उतरा मैं घट के भीतर
गोता उतर’ लगाया !
स्व खो’कर सर्वस्व पा लिया;
परमानंद मुस्काया !!

.......................waah

Nisha Kothari

अभिषेक प्रसाद ने कहा…

khucsurat abhivyakti...

Dileep Vasishth ने कहा…

स्व से सर्वस्व तक की यात्रा
धन्य है आप...।


Dileep Vasishth

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

जितनी सुन्दर रचना उतनी ही सुन्दर प्रस्तुति....
इस सुन्दर रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई.

Indu Puri Goswami ने कहा…

जब उतरा मैं घट के भीतर

गोता उतर’ लगाया !

स्व खो’कर सर्वस्व पा लिया;

परमानंद मुस्काया !!

वाह!

जो सीख लिया है इतना
छोटा हुआ जग सागर,
बहुत बड़ी गहरी है बाबु
ये अंतर्मन की गागर

Indu Puri Goswami

बेनामी ने कहा…

अध्यात्म की पहेली ! सुन्दर कविता !

Anita ने कहा…

सही है, भीतर जाकर ही खुद से मिलना होता है.

Divya Shukla ने कहा…

स्व खो’कर सर्वस्व पा लिया;
परमानंद मुस्काया --------

सब कुछ पा लिया अब शेष ही क्या रहा ----
वाह


-दिव्या शुक्ला

veerubhai ने कहा…

कितने सागर, कितनी नदियां,
कितना नीर तलाशा !
व्याकुल मन को थाह मिली ना,
है प्यासा का प्यासा !!
मोकु कहां ढूंढें रे बंदे मैं तो तेरे ......

Aditya Tayal ने कहा…

आदरणीय भाई राजेन्द्र जी की आध्यात्मिक रचना आत्मावलोकन करने के लिये उत्प्रेरित करती है
स्वयं ही स्वयं की मूरत (अंत:स्थल)में उतरकर अंतस की कुन्डलनी मूलाधार से सहस्त्रार तक जाग्रत करना पड़ेगी
तब जाकर स्व तत्व विलीन होगा, और शांति,मुक्ति का स्थायी-भाव संचरित होगा ..

भाई राजेन्द्र जी की रचनाएं अप्रतिम सौदर्य और शांति तत्व लिये होती हैं संगीत स्वभाव की भी और सशक्त भाव भी भरपूर होता हैं
अत: उन पर टिप्पणी सूरज को दिया दिखाने योग्य होती हैं

...सुंदर रचना पर मेरी बहुत बहुत बधाई ...


Aditya Tayal

Rajput ने कहा…

बहुत खुबसुरत , लाजवाब
बहुत बहुत बधाई .

Sia Kumar ने कहा…

कदम-कदम पर होने वाले सच से सामने के पलों को बहुत खूबसूरत शब्दों में आपने लिखा है..
मन के बहुत गहरे और आध्यात्मिक भावों के जरिये उस हस्ती के दर्शन करवाएं हैं..
बहुत सुंदरता से आपने इंसान भाग दौड को लिखा है अपनी इस रचना में
लेकिन फिर भी किस तरह से वो अपने आपको असहाय सा महसूस करता है
इसको बहुत सुन्दर लिखा है इस रचना में..

बधाई स्वीकार करें.. Rajendra Swarnkar ji


~Sia Kumar

सुज्ञ ने कहा…

अद्भुत निरीक्षण!! वाकई घट में उतर क्र ही आप ले आए है यह सार-तत्व!!

सुज्ञ ने कहा…

अद्भुत निरीक्षण!! वाकई घट में उतर क्र ही आप ले आए है यह सार-तत्व!!

sushila ने कहा…

लाजवाब भावाभिव्यक्‍ति भाई सा ! अंतिम पद तो बेमिसाल है ! बधाई

Surendar Nawal ने कहा…

Rajendra स्वर्णकार भाई साहब
सरल और कसे हुए शब्दों के संयोजन में एक बेहद खूबसूरत प्रवाह लिए हुए
सशक्त भावों की इस शानदार अभिव्यक्ति के लिए आपको हार्दिक बधाई...

बहुत सुन्दर, बेजोड़, कमाल की रचना है...
पढ़ते पढ़ते रोम-रोम सिहर गया...
सादर वन्दे...


~ सुरेन्द्र नवल

महेश सोनी ने कहा…

bahut khub waaah

dinesh gautam ने कहा…

बहुत बढि़या रचना राजेन्द्र जी। अध्यात्म के रंग में रंगी स्व की खोज के लिए प्रेरित करती रचना।

Akhil ने कहा…

bahut bahut sundar...bahut badhai..

Jitendra Dave ने कहा…

आपकी रचनाये साहित्य पठान के सुख से ज्यादा...आध्यात्मिक सुख भी देती हैं. हमेशा की तरह.

Chandrani the Dreams ने कहा…

man ko chu gayi ye rahchna...

Mansoor Ali ने कहा…

बहुत ख़ूब, राजेंद्रजी, बहुत ख़ूब.

'आध्यात्म' से गूढ़ विषय पर.... क़दम दर क़दम आगे बढ़ाते हुए मंजिल तक पहुंचा दिया है. सार्थक शायरी, अति सुन्दर प्रस्तुति.

mahendra verma ने कहा…

इस घट के भीतर ही सब-कुछ समाया है।
अपने भीतर तलाशने से ही ‘उसे‘ पाया जा सकता है।

शांति प्रदायिनी रचना।

रजनीश तिवारी ने कहा…

bahut hi achchhi prastuti..shubhkamnayen !!

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति भाई राजेन्द्र जी

minoo bhagia ने कहा…

Beautiful presentation

kanu..... ने कहा…

waah! last ka para sabse badhiya laga mujhe...

Dilip Dixit ने कहा…

अत्यंत सरल शब्दों में परमानन्द प्राप्ति का रास्ता बता दिया,
बहुत खूब !

आपने अपनी रचना में मनुष्य द्वारा परमानन्द प्राप्ति के लिए
अपने सम्पूर्ण जीवन काल में किये गए अनेको जतनो के बजाय
स्व खोकर सर्वस्व पाने का अनुकरणीय सन्देश दिया है !



Dilip Dixit

मेरा साहित्य ने कहा…

sva kho kar hi parmeshvar milta hai
bahut hi sunder rachna
rachana

आशा जोगळेकर ने कहा…

अपने घट के भीतर उतरना ही जरूरी है पर कठिन भी बहुत है ।
बेहद सुंदर और सच्ची रचना ।